पलायन पर अंकुश और विकास के सवालों को केंद्र में रखकर अलग राज्य की लड़ाई लड़ी गई। अलग राज्य बनने के बाद भी पलायन की रफ्तार धीमी नहीं हुई, बल्कि और तेज हो गई। पहले रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर पलायन होता रहा। अब आपदा से बचाव के लिए भी पलायन हो रहा है।
केस- एक
मानूर गांव निवासी देव सिंह नेगी करीब पांच दशक पहले नारायणबगड़ में आकर बस गए थे। यहां उन्हाेंने दुकान और मकान बनाया। उनके निधन के बाद उनके बेटे बीरेंद्र सिंह ने दुकानदारी संभाली। लेकिन 16-17 जून की आपदा में मकान और दुकान बह गए। जिस स्कूल में बीरेंद्र के बच्चे पढ़ते थे, वह भी क्षतिग्रस्त हो गया। यहां से गांव दूर होने और वहां साधनों के अभाव में जीवन यापन आसान नहीं था। ऐसे में यह परिवार अब देहरादून में शिफ्ट हो गया है।
केस- दो
पाली गांव के बीएस नेगी की नारायणबगड़ मुख्य बाजार में दुकान है। वे पुराना बाजार में किराये के मकान में सपरिवार रहते थे। लेकिन यह मकान आपदा की भेंट चढ़ गया। बच्चे गुरु रामराय पब्लिक स्कूल पंती में पढ़ते थे। कर्णप्रयाग-ग्वालदम मार्ग बंद होने से बच्चों का स्कूल जाना भी बंद हो गया। ऐसे में यह परिवार दस जुलाई को देहरादून में शिफ्ट हो गया है।
पहले रोजी-रोटी के लिए गांव से सड़क के किनारे विकसित हो रहे कस्बों में पलायन किया था। अच्छी आर्थिक स्थिति भी बनी। कई लोगों ने अपने मकान और दुकानें बनाई। सामाजिक रुतबा भी हासिल किया। बच्चों के लिए भी इन कस्बों में पढ़ाई के लिए अच्छे स्कूल खुल गए थे। ऐसे में जिंदगी खुशहाली से कट रही थी।
समय चक्र बदला। आपदा ने सब तबाह कर दिया। दुकान-मकान बह गए। स्कूल क्षतिग्रस्त हो गए। गांव के मकान भी रहने लायक नहीं रहे। वहां सुविधाएं भी ऐसी नहीं रही कि जीवन को फिर से पटरी पर ला सकें। ऐसे में कई परिवारों ने देहरादून जैसे मैदानी इलाकों की ओर पलायन कर दिया। इस बार आपदा से पैदा हुआ खौफ पलायन का कारण बना।
आपदा से प्रभावित पिंडरघाटी के नारायणबगड़ में 17 जून के बाद से अब तक करीब साठ परिवार गौचर, श्रीनगर और देहरादून चले गए हैं। इधर कमेड़ा गांव के पांच परिवार भी गांव में भूस्खलन के खतरे के चलते गौचर में शिफ्ट हो गए हैं।
इनका कहना है
आपदा से नारायणबगड़ का पुराना बाजार ध्वस्त हो गया। मकान, दुकानें पिंडर नदी में बह गए हैं। अब भय है। ऐसे में परिवार की कुशलता और सुरक्षित स्थान को देखते हुए लोग पलायन के सिवाय कोई रास्ता भी तो नहीं है।
- बीएस रावत आपदा प्रभावित नारायणबड़ (पुराना बाजार)
चालीस फीसदी लोग अन्यत्र शिफ्ट
मंदाकिनी घाटी में सन्नाटा पसरने लगा है। अपने परिवार की सुरक्षा के लिए लोग पलायन के लिए मजबूर हो गए है। अगस्त्यमुनि कस्बे में अब तक करीब चालीस फीसदी लोग अन्यत्र शिफ्ट हो गए हैं। जबकि कुछ जाने की तैयारी में है।
अगस्त्यमुनि कस्बा जिले में एजुकेशनल हब के तौर पर प्रसिद्ध है। बच्चों को बेहतर शिक्षा मुहैया कराने के लिए अधिकांश लोग यहां किराये पर कमरा लेकर रहते थे। अभिभावक अपने बच्चों और परिवार की सुरक्षा को देखते हुए पलायन करने लगे हैं। जिसका सबसे अधिक असर शिक्षण संस्थानों पर पड़ा है। शिक्षण संस्थानों में छात्र संख्या में तेजी से कटौती हुई है।
सीमावर्ती गांवों से बढ़ा अंतर्क्षेत्रीय पलायन
बरसात में सड़क संपर्क कटने तथा बगीचों, खेतों और गांव में भूस्खलन के बढ़ते खतरे से निराश सीमावर्ती क्षेत्र के गांवों में अंतरक्षेत्रीय पलायन तेज हुआ है। इस वर्ष मुखबा, धराली, हर्षिल, बगोरी के 1059 परिवारों में से 90 प्रतिशत परिवार पांच महीने पहले ही उत्तरकाशी के आसपास अपने शीतकालीन प्रवासों में लौट आए हैं। वर्षभर गांव में रहने वाले उपला टकनौर के चार गांवों से भी 47 परिवारों ने उत्तरकाशी में किराये के घरों में बसेरा बना लिया है।
आपदा की मार से हर्षिल, मुखबा, धराली और बगोरी के 90 फीसदी परिवार समय से पांच माह पहले ही पलायन कर गए हैं। स्थिति यह है कि गांव में राशन, चीनी, चायपत्ती, नमक, गुड़, तेल, साबुन, दाल आदि उपलब्ध न होने से उनका वहां ज्यादा दिन ठहरना मुश्किल हो गया था।
फसल का मोह भी गांव में नहीं बांध पाया
उपला टकनौर के चार और सीमांत गांव सुक्की, जसपुर, झाला और पुराली में भी 520 परिवारों में से 47 परिवार उत्तरकाशी शहर में शिफ्ट हो गए हैं। सेब, आलू और राजमा की लाखों की फसल का मोह भी गांव में नहीं बांध पाया।
इस क्षेत्र के लोग देश की सीमाओं के मुफ्त प्रहरी हैं। हर बरसात में सड़क अवरुद्ध होने से ये गांव अलग-थलग पड़े रहते हैं। गांव तथा बागीचे भूस्खलन की चपेट में आने से नष्ट हो रहे हैं। ऐसे में जब इस सीमावर्ती क्षेत्र की कोई सुध नहीं लेगा तो हम वहां रहकर क्या करेंगे।
- परमानंद सेमवाल, प्रधान, ग्राम पंचायत मुखबा