पहले पूरे उत्तराखंड में पशु बलि के लिए चर्चित रहा राठ क्षेत्र का बूंखाल मेला इस बार भी बिना पशुबलि के शांतिपूर्वक संपन्न हो गया है। अब तक के इतिहास में पांचवीं बार यह मेला बेगुनाह पशुओं के खून बहे बिना ही संपन्न हुआ। मेले में गढ़वाल मंडल के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ आया।
मेले में कोई भी श्रद्धालु बलि देने के लिए बागी और बकरा नहीं पहुंचा। देवी को चढ़ाने के लिए गोदा, मलुंड, नलई, मिलई, चोपड़ा आदि गांवों से लोग बागी के स्थान पर ढोल दमाऊं के साथ देवी देवताओं की डोलियां लाए। नारियल चढ़ाकर देवी की सात्विक पूजा अर्चना की। डोलियों के आगमन के दौरान पूरा क्षेत्र माता के उद्घोष से गूंजता रहा। देवी के जयकारों और ढोल दमाऊं की थाप पर श्रद्धालु भी खूब झूमेे।
प्रशासन ने पशु बलि रोकने के लिए व्यापक इंतजाम किए थे। पशुओं को मेला स्थल तक ले जाने से रोकने के लिए जगह-जगह चेक पोस्ट बनाए हुए थे जिनमें समुचित पुलिस फोर्स तैनात थी। मेले में सुबह से ही लोगों का पहुंचना शुरू हो गया था। मंदिर में बने बलि कुंड के समीप हवन-पूजन किया गया जो काफी देर तक चला। इसके बाद मंदिर में बलि के लिए बनाए गए कुंड में पूजा अर्चना के साथ नारियल और तेल चढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हुई। गढ़वाल के विभिन्न क्षेत्रों से मेले में पहुंचे श्रद्धालुओं ने कुंड में नारियल, तेल और पूजन सामग्री चढ़ाई। कुंड के समीप देवी के दर्शनों को लेकर क्षेत्रवासियों में काफी उत्साह दिखा।
दिन में एक बजे के बाद मेले में गांवों से देवी देवताओं की डोलियों का आगमन शुरू हुआ। गोदा , मलुंड, नलई, मिलई, चोपड़ा समेत कई गांवों से देवी देवताओं की डोली को ढोल दमांऊ के साथ मंदिर तक लाया गया। मेले में लगे स्टालों पर महिलाओं, बच्चों ने जमकर खरीददारी की।