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‘छुट्टियों में घुमाने का वादा कर ड्यूटी पर गए थे पापा’

Thu, 25 Feb 2016 09:38 PM IST
कोटद्वार
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छह महीने पहले की बात है, जब परमेंद्र अपने बच्चों से इस बार गर्मी में गांव के साथ ही मुंबई घुमाने का वादा कर गए थे। पिता तो नहीं लौटे, लेकिन बृहस्पतिवार को उनका ताबूत में बंद पार्थिव शरीर लेकर जैसे ही सेना के जवान गांव पहुंचे, बेटे बिलख पड़े। पत्नी संगीता बेहोश हो गई। पिता की बूढ़ी आंखों से आंसू बह निकले। बड़े भाई, भाभी और भतीजे, भतीजी बिलख पड़े। पूरा गांव रो पड़ा।
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थ्री पैरा स्पेशल फोर्स के हवलदार परमेंद्र ध्यानी दो साल की प्रतिनियुक्ति पर 31 राष्ट्रीय राइफल्स में गए थे। जम्मू कश्मीर जाने से पहले इस बार वह अपने दोनों बेटों प्रियांशु, हिमांशु और पत्नी संगीता को गर्मी की छुट्टी में घुमाने का वादा कर गए थे। यह बात बिलखते हुए उनके बेटों ने अपने दादा गोविंदराम ध्यानी और ताऊ-ताई को बताई तो सभी बिलख पड़े। बच्चों के सिर से पिता का साया उठा तो पत्नी की मांग का सिंदूर उजड़ा। बूढ़े पिता की आंखों से छलक रहे आंसू उनके दुख को बयां कर रहे थे। छोटे भाई की मौत से तीनों बड़े भाई बीरेंद्र, यतेंद्र और कैलाश और उनके परिजन शोक में डूबे थे। सभी को परमेंद्र की बातें रह-रहकर याद आ रही थी।

बेटे की मौत दे गई गहरा जख्म
गत वर्ष अप्रैल माह में अपने साले की शादी में शामिल होने आया परमेंद्र परिवार समेत अपने गांव बगेड़ा भी आया था। तब वह इस बार की गर्मियों में आने का वादा कर गया था। वह तो नहीं आया, लेकिन जम्मू कश्मीर से तिरंगे में लिपटा उसका शव गांव पहुंचा तो पूरा गांव शोक में डूब गया। चार भाइयों में सबसे छोटे परमेंद्र की मां का पहले ही निधन हो चुका  था। पिता गोविंदराम ध्यानी अपने बड़े बेटे के परिवार के साथ गांव में जीवनयापन कर रहे हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव में बेटे की मौत उन्हें गहरा जख्म दे गई। परिजन बताते हैं कि इस बार गर्मियों की छुट्टियों में परमेंद्र बच्चों को ग्वालियर से देहरादून शिफ्ट करने की बात कर रहा था।
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पिता आए जरूर लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए
पति की मौत से पत्नी संगीता सदमे में है। बृहस्पतिवार सुबह जैसे ही ताबूत में बंद पति का शव घर पहुंचा, वह शव से लिपटकर बिलखने लगी। परिजनों ने बड़ी मुश्किल से से शव से हटाया। परमेंद्र के तेरह वर्षीय बड़े बेटे प्रियांशु का कहना था कि उसके पिता इस बार की छुट्टियों में उन्हें घुमाने का वादा कर ड्यूटी पर जम्मू-कश्मीर गए थे। पिता आए तो जरूर, लेकिन ताबूत में तिरंगे से लिपटे हुए।
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