मलेथा में स्टोन क्रशरों के विरोध में सिर मुंडाने और 10 दिनों तक आमरण अनशन करने वाले मलेथा के ग्राम प्रधान शूरवीर बिष्ट के सुर बदलने से सभी हैरान हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर तीन स्टोन क्रशरों की पैरवी करते हुए उनके संचालन की जरूरत बताई है। उनकी इस पैरवी के कई मायने निकाले जा रहे हैं। हालांकि प्रधान ने इसके पीछे जनप्रतिनिधियों और जनता के दबाव को कारण बताया है।
पिछले वर्ष प्रदेश शासन ने ग्राम पंचायत मलेथा और इससे सटे चौपड़ियां गांव में पांच स्टोन क्रशरों की मंजूरी दी थी। इसके विरोध में अगस्त 2014 से ग्राम प्रधान शूरवीर बिष्ट एवं हिमालय बचाओ आंदोलन के समीर रतूड़ी के नेतृत्व में आंदोलन हुआ। तब आमरण अनशन में बैठी आंदोलनकारी सीता देवी को जब प्रशासन ने उठाया तो विरोध में सात आंदोलनकारियों ने मुंडन कराया। इसमें शूरवीर सिंह सबसे आगे रहे। उन्होंने 07 से 16 जून तक आमरण अनशन भी किया। करीब 11 माह चले आंदोलन में शूरवीर सबसे आगे रहे। पांच क्रशर निरस्त होने के बाद अब अचानक प्रधान ने दूसरी राह पकड़ ली। कल तक क्रशरों से पर्यावरण, खेती, जंगल और घरों को नुकसान पहुंचने की बात कहने वाले प्रधान क्रशरों को जरूरी बताने लगे हैं।
दो दिसंबर को सीएम को भेजे गए पत्र में उन्होंने मलेथा में शिव गंगा स्टोन क्रशर (चौपडिय़ा), सत्यम शिवम सुंदरम (मलेथा) और देवेंद्र दत्त बलूनी क्रशर(मलेथा) को संचालित करने की मांग की है। उनका कहना है कि ग्राम पंचायत की 75 फीसदी जनता चाहती है कि क्रशर चले। कुछ बाहरी लोग उनकी ग्राम पंचायत में आकर ग्रामीणों को गुमराह कर रहे हैं। शूरवीर के इस कदम से ग्रामीण हैरान हैं। उनकी समझ में यह नही आ रहा है कि आंदोलन को पूरी दिशा देने वाले प्रधान ने पलटी क्यों मारी? पर्यावरण संरक्षण और कृषि बचाने के लिए उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर भी छा गया था।