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अपने गांवों को आबाद करें प्रवासी उत्तराखंडी

Sat, 02 Jan 2016 08:26 PM IST
कोटद्वार
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हिमालयी धरोहर अध्ययन केंद्र के निदेशक डा. पद्मेश बुड़ाकोटी ने पहाड़ में खाली होते गांवों के तेजी से खंडहर में तब्दील होने पर चिंता प्रकट करते हुए प्रवासी समाज से अपने गांव लौटने की अपील की है।
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पहाड़ में गांव बचाओ अभियान के सूत्रधार डा. बुड़ाकोटी ने पौड़ी गढ़वाल जिले के जयहरीखाल ब्लॉक की मधुगंगा घाटी के कई गांवों का पैदल भ्रमण किया। शनिवार को यहां लौटे बुड़ाकोटी ने बताया कि क्षेत्र की करीब आधी से ज्यादा आबादी सुविधाओं की चाह में मैदानी शहरों की ओर पलायन कर चुकी है। अधिकांश गांवों में बुजुर्ग लोग ही नजर आ रहे हैं। स्थानीय जनता जंगली जानवरों से भयाक्रांत है। दिन में ही गांव के बीच बाघ और सूअर नजर आ रहे हैं। बंदरों ने लोगों की खेती तहस-नहस कर दी है।

उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी बुड़ाकोटी ने बताया कि जयहरीखाल के कई गांव खंडहर में तब्दील होने लगे हैं। ग्राम डोबा, कंदोली, पीड़ा, जुई, चाई, मठाली, गिंवाली, नायूंसारी, चुंडई के चारों तरफ लैंटाना और काली घास की झाड़ियां उग आई है जो इन गांवों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन गई है। मनरेगा और अन्य तमाम योजनाओं के बावजूद इन गांवों की पगडंडियां झाड़ियों के बीच कहीं दफन हो गई हैं। राहगीरों का उन पर चलना मुश्किल हो गया है।
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डा. बुड़ाकोटी ने कहा कि जंगली जानवरों के भय से लोगाें ने पारंपरिक खेती किसानी छोड़ दी है। अब वह पशुपालन से भी किनारा करने लगे हैं। सबसे बड़ा खतरा उन मासूम बच्चों के लिए हैं जो कई किमी की दूरी पैदल नाप कर स्कूल जाते हैं। उन्हाेेंने कहा कि कृषि तथा पशुपालन का लुप्त होना पहाड़ की संस्कृति व सभ्यता के लिए गहरी चोट होगी। कहा कि पर्वतीय क्षेत्र में गांवों के अस्तित्व को बचाने के लिए यहां तत्काल जंगली जानवरों के आतंक को नियंत्रित किया जाना जरूरी है। गांव से बाहर गए प्रवासी अपने गांव लौटे और विरासत के प्रतीक अपने पैतृक भवनों की मरम्मत करें। संपूर्ण पर्वतीय क्षेत्र में चकबंदी लागू की जाए। मनरेगा के अंतर्गत खेती-किसानी को बढ़ावा दिया जाए। ग्रामीण क्षेत्र में आधुनिक शिक्षा पद्धति, स्वास्थ्य सुविधा एवं रोजगार की पुख्ता व्यवस्था बहुत जरूरी है।
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