राजकीय संयुक्त चिकित्सालय में डिलीवरी के लिए पंजीकरण कराने के बावजूद निजी अस्पतालों में गर्भवती को रेफर कर दिया जाता है। इससे न केवल मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है बल्कि ऐन वक्त पर गंभीर हालत होने की स्थिति में परिजनों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पिछले 15 दिनों में सात गर्भवती महिलाओं को अन्य जगहों पर रेफर किया गया है। कारण, अस्पताल के गायनी विभाग में एक महीने से एक भी महिला सर्जन नहीं है।
कोटद्वार के राजकीय संयुक्त चिकित्सालय की बहुमंजिला इमारतें तो बना दी गई। स्वास्थ्य विभाग ने गर्भवती महिलाओं को लाने और प्रसव के बाद घर तक छोड़ने के लिए सरकारी वाहन ‘खुशियों की सवारी’ भी लगा दिया। इस क्रम में वाहन गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक तो ला रही है, लेकिन गर्भपात के समय उन्हें 108 सेवा के माध्यम से प्राइवेट क्लीनिकों में रेफर किया जा रहा है। महिलाएं पहले महीने से अस्पताल में अपना पंजीकरण कराकर नियमित जांच कराती हैं। इस भरोसे कि सरकारी अस्पताल में डिलीवरी होगी, मां के पोषण के लिए पैसे भी मिलेंगे और ‘खुशियों की सवार’ घर तक छोड़ने आएगी। लेकिन आठ महीने तक चेकअप कराने के बाद डॉक्टर सब कुछ सही सलामत बताते हैं और जब डिलीवरी का समय आता है तो बच्चे की हालत खराब बताकर उसे अन्य जगह रेफर कर दिया जाता है। ऐसी हालत में लोग नजदीक कोटद्वार के प्राइवेट क्लीनिकों की शरण में जाते हैं, जहां उन्हें फिर 25 से 30 हजार रुपये खर्च करने पड़ जाते हैं।
बता दें कि राजकीय चिकित्सालय की एकमात्र महिला सर्जन डॉ. मालती यादव पारिवारिक कारणों से 19 दिसंबर से छुट्टी पर चल रही हैं। सूत्रों की मानें तो वह अब कोटद्वार अस्पताल में नहीं आना चाहतीं। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग अन्य महिला सर्जन की तैनाती करने की अपेक्षा लोगों को रेफर करने में लगा हुआ है। जनवरी के आंकड़ों की बात करें तो 15 दिनों में सात महिलाओं को रेफर कर दिया गया है।
परेशानी लोगों की जुबानी
कोटद्वार निवासी चंद्रमोहन बिंजोला, राजेंद्र सिंह नेगी, हर्षपाल रावत, राकेश नेगी ने बताया कि उनके रिस्तेदार का राजकीय अस्पताल में डिलीवरी कार्ड बना हुआ था। वह लगातार चेकअप करा रही थी, अंतिम समय तक डाक्टरों से सबकुछ ठीक होने का आश्वासन दिया। लेकिन नौ महीने में जब वे डिलीवरी के लिए अस्पताल में भर्ती हुए तो डिलीवरी के कुछ घंटे पहले उन्हें वहां से अन्य स्थान जाने के लिए कह दिया गया। आनन फानन में वे निजदीक एक प्राइवेट क्लीनिक पहुंचे जहां उनसे आपरेशन के नाम पर 25-30 हजार रुपय वसूल लिए गए। उन्होंने किसी प्रकार कर्जा लेकर क्लीनिक के बिल का भुगतान किया।
कोट
यह बात सही है कि अस्पताल में महिला सर्जन नहीं है जिसके कारण डिलीवरी के गंभीर मामलों को रेफर करने के अलावा कोई चारा नहीं होता है। अस्पताल में महिला सर्जन की व्यवस्था के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
- डॉ. आईएस सामंत , सीएमएस कोटद्वार