ब्रिटिश रायल नेवी में रहकर अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन का बिगुल फुंकने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोकुल प्रसाद भट्ट (94) नहीं रहे। वह रुद्रप्रयाग में खांकरा के पास दैजीमांडा के रहने वाले थे। उन्होंने कोटद्वार के सिताबपुर गांव में अपनी बड़ी बेटी लक्ष्मी देवी के यहां अंतिम सांस ली। नवंबर में पत्नी के निधन के बाद अकेले पड़े वयोवृद्ध सेनानी को उनके परिजन कोटद्वार ले आए थे। यहां उनका उपचार भी चल रहा था। दो-तीन दिनों से उन्होंने खाना-पीना भी छोड़ दिया था।
बृहस्पतिवार रात करीब ढाई बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। सूचना मिलते ही जिला प्रशासन की ओर से तहसीलदार अबरार हुसैन, नायब तहसीलदार दिलीप सिंह नेगी, पटवारी कैलाश रवि सिताबपुर पहुंचे और उनके पार्थिव शरीर पर तिरंगा लपेटकर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। इससे पूर्व भाजपा के पूर्व विधायक शैलेंद्र सिंह रावत, भाजपा जिलाध्यक्ष धीरेंद्र चौहान समेत गणमान्य नागरिकों ने उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए। स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी की ओर से उनके जनसंपर्क अधिकारी दर्शन सिंह रावत ने श्रद्धांजलि अर्पित की। उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार चंडीघाट में किया गया। जहां नायब तहसीलदार दिलीप सिंह नेगी ने उन्हें प्रशासन की ओर से शव पर पुष्प चढ़ाकर अंतिम विदाई दी।
गोकुल प्रसाद भट्ट अपने पीछे दो पुत्रियों लक्ष्मी और कल्पेश्वरी का भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनका कोई बेटा नहीं था। उनके बड़े दामाद महेश चंद्र बिड़ला और छोटे दामाद टीकाराम थपलियाल ने उन्हें मुखाग्नि दी।
लखनऊ सेंट्रल जेल में भी रहे
कोटद्वार। रुद्रप्रयाग जिले में खांकरा के पास दैजीमाण्डा गांव निवासी गोकुल प्रसाद भट्ट का जन्म 23 जुलाई 1922 को हुआ। प्राथमिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त करने के बाद 1943 में ब्रिटिश रायल नेवी में भर्ती हो गए। उस दौरान देशभर में आजादी का आंदोलन चरम पर था। ऐसे में ब्रिटिश सेना में कार्यरत भारतीयों के अंदर भी आजादी की छटपटाहट थी। भट्ट भी इसमें पीछे कैसे रह सकते थे। 18 फरवरी 1946 को एचएनआईएस नर्वदा शिप से ब्रिटिश झंडा उतारकर उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ तिरंगा फहरा दिया था। इसके बाद उन पर ब्रिटिश अधिकारियों ने बोर्ड ऑफ इनक्वायरी के सम्मुख पेश कर लखनऊ सेंट्रल जेल में डाल दिया गया। पुलिस हिरासत में रखकर उन्हें और उनके पांच साथियों को तरह-तरह की यातनाएं दी गई। दो दिनों तक सहारनपुर जिला जेल में भी रखा गया। जेल से छूटने के बाद नेवल विद्रोह का यह नायक पूरी तरह से स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में कूद पड़ा। देश की आजादी की 24वीं वर्षगांठ पर उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्र पत्र देकर सम्मानित किया। महाराष्ट्र सरकार ने भी उन्हें सम्मानित किया।