प्रशासन आपदा पीड़ितों को मुआवजा दिए जाने के दावे तो कर रहा है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कुछ लोगों को आज भी मुआवजा नहीं मिल पाया है। यमकेश्वर के बुकंडी गांव निवासी प्रताप सिंह पुत्र स्व. कुत्तु सिंह की वर्ष 2014 में आपदा के दौरान बाढ़ आने से मकान, चक्की और जमीन बह गई थी। लेकिन वह आज भी आपदा के मुआवजे के लिए दर-दर भटक रहा है, उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
आपदा प्रभावित प्रताप सिंह का कहना है कि यमकेश्वर के बुकंडी गांव में वह अपने दो भाइयों के साथ पुस्तैनी मकान में रहता था। उसने अपने रोजगार के लिए अक्तूबर 2013 में करीब 65 हजार की लागत से गांव में ही एक कुटाई-पिसाई की चक्की लगाई थी। इसके लिए उसने स्थानीय बैंक से भी ऋण लिया था। 14 अगस्त 2014 को आई आपदा में उनका पुस्तैनी मकान, कुटाई-पिसाई की चक्की और जमीन बह गई। प्रताप सिंह ने आपदा में हुई क्षति के मुआवजे के लिए शासन-प्रशासन में कई बार गुहार लगाई पर कोई उसकी सुध नहीं ले रहा है। उसका कहना है कुटाई-पिसाई की चक्की बहने से उसका रोजगार खत्म हो गया है और उसके द्वारा लिए गए बैंक ऋण का बोझ भी उसके सिर पर है। इसके चलते वह कोटद्वार भाबर में आकर मजदूरी करने के लिए मजबूर है। बताया कि गांव के कई लोगों को मुआवजा मिल गया है किंतु वह आज भी मुआवजे के लिए भटकने को मजबूर है। प्रताप ने शासन-प्रशासन से पुन: जांच कर आपदा के मानकों के अनुसार मुआवजा देने की मांग की है जिससे वह दोबारा अपना रोजगार शुरू कर बैंक के ऋण का बोझ खत्म कर सके।
उधर, उपजिलाधिकारी जीआर बिनवाल ने बताया कि इस प्रकार का मामला संज्ञान में नहीं है, कर्मचारियों को भेजकर मामले की जांच की जाएगी। मामला सही पाए जाने पर मुआवजे की कार्रवाई की जाएगी।