जयहरीखाल। दो दिवसीय भैरवगढ़ी मेले का आगाज शुक्रवार को राजखिल गांव से मंदिर तक निकली जात यात्रा के साथ हो गया। मेले में भैरवगढ़ी क्षेत्र के आसपास के गांवों के हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़े। शनिवार को भंडारे के साथ ही यहां मेले का आयोजन किया जाएगा। रातभर धार्मिक अनुष्ठान और कीर्तन भजनों का दौर चलेगा।
द्वारीखाल विकास खंड में गुमखाल-ऋषिकेश मार्ग पर कीर्तिखाल से करीब तीन किमी की पैदल दूरी पर स्थित पर्वत की चोटी पर स्थित ऐतिहासिक भैरवगढ़ी का वार्षिक दो दिवसीय मेला शुक्रवार को पारंपरिक जात यात्रा के साथ शुरू हो गया है। मेले में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में प्रवासी बंधु अपने गांव पहुंच गए हैं। शुक्रवार को राजखिल गांव से शुरू हुई जात यात्रा भैरवगढ़ी मंदिर परिसर तक पहुंची। इसके बाद यहां विधिवत धार्मिक अनुष्ठान व पूजा-अर्चना शुरू हो गई। जात यात्रा का शुभारंभ गांव के पुरोहित जगदीश डोबरियाल ने बतौर मुख्य अतिथि किया। लंगूरी गांव के निवासी मंदिर के पुजारी मदनमोहन डोबरियाल ने धार्मिक अनुष्ठान कराए।
गोरखाओं के आक्रमण से जुड़ा है ऐतिहासिक भैरवगढ़ी का इतिहास
गढ़वाल की तत्कालीन दक्षिणी सीमा पर स्थित परगना गंगा सलाण का प्रमुख गढ़ रहा भैरवगढ़ी
प्रकाश असवाल
जयहरीखाल। भैरवगढ़ी का इतिहास गढ़वाल में गोरखा आक्रमण से जुड़ा है। ग्रामीण बताते हैं कि सन 1790 में चंद्रवीर और भक्ति थापा के नेतृत्व में हुआ गोरखा आक्रमण 28 दिन तक चला। इसमें गोरखा विफल हो गए। गढ़वाल की तत्कालीन दक्षिणी सीमा पर परगना गंगा सलाण का सामरिक रूप से संवेदनशील यह गढ़ सन 1804 के दूसरे हमले में गोरखों के कब्जे में चला गया। यहां कालांतर में उनके द्वारा मंदिर की स्थापना की गई।
भैरवगढ़ी मंदिर समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह रावत बताते हैं कि क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई पौड़ी की एक रिपोर्ट में यहां स्थापित शिवलिंग के ऊपर 40 सेर वजनी ताम्रपत्र चढ़ा है। इस पर फाल्गुन संवत 1884 के साथ देवनागरी लिपि में भक्ति थापा के नाम का उल्लेख है। माना जाता है कि इसे गोरखों ने अपने वर्चस्व स्वरूप मंदिर में चढ़ाया था। यहां 30 गुणा 15 सेमी माप की पंचाग्नितप हरे रंग की देवी पार्वती की पाषाण प्रतिमा दर्शनीय है। शैलीगत आधार पर यह प्रतिमा 10वीं, 11वीं शताब्दी की बताई गई है। इतिहास के इस प्रसंग से अलग भैरवगढ़ी सिद्धपीठ होने के कारण क्षेत्र में श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। यहां साल भर नवविवाहित जोड़ों सहित भक्त मनौतियां मांगने पहुंचते हैं। अन्य किवदंतियों में इसे साक्षात भैरव बाबा का निवास बताया गया है।
मंदिर के पुजारी मदनमोहन डोबरियाल बताते हैं कि करीब 7000 फीट ऊंचे शिखर पर स्थित इस मंदिर से गढ़वाल हिमालय की बर्फीली चोटियों सहित एक बड़े क्षेत्र के दर्शन होते हैं, जो आगंतुकों को रोमांच से भर देता है।
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