फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राज्यपाल की मान लेते तो न होती भाजपा की फजीहत

Thu, 12 May 2016 01:57 AM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, देहरादून

सार

  • भाजपा को नहीं भाया था हरीश को राज्यपाल द्वारा दिया गया समय
  • बागियों, विनियोग विधेयक को ध्यान में रख फ्लोर टेस्ट निर्णय रहा बरकरार
विज्ञापन
गवर्नर केके पॉल - फोटो : amar ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

प्रदेश में 18 मार्च के सियासी संकट के बाद राजभवन के फैसले को अंत तक हर अदालत ने बरकरार रखा। भाजपा की केंद्रीय लीडरशिप अगर राजभवन के लिए फैसले को मान लेती तो दो माह तक प्रदेश में सियासी उठापटक के साथ अपनी सियासी फजीहत से भी बच जाती।
विज्ञापन


राजभवन ने 9 कांग्रेस विधायकों पर दल बदल कानून की प्रक्रिया से लेकर फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था। राजभवन के निर्णय पर 28 मार्च को फ्लोर टेस्ट की जो स्थित बननी थी, कमोबेश वही 10 मई को भी रही।

दो माह की खींचतान के बाद भाजपा को मिली सियासी हार से कांग्रेस को फ्लोर ही नहीं, बल्कि अगले चुनावी रण में भी लाभ मिलने की संभावना रहेगी।

राज्यपाल केके पाल ने विनियोग विधेयक, कांग्रेस में बगावत और सदन के फ्लोर टेस्ट की मांग को लेकर दस दिन का समय कांग्रेस को दे दिया। राज्यपाल के इस फैसले को लेकर भाजपा में जलजला पैदा हो गया और फिर स्टिंग के बाद राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।
विज्ञापन

बागियों को समय न देने पर सर्वाधिक थी आपत्ति

हरक स‌िंह रावत के साथ बागी विधायक - फोटो : AmarUjala
कांग्रेस से बागी हुए नौ विधायकों पर दल बदल कानून के तहत कार्रवाई के लिए पर्याप्त समय न देने पर आपत्ति सर्वाधिक थी। फैसले पर भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया आई कि राजभवन के फैसले से बागी बर्खास्त हो सकते हैं, जबकि फ्लोर टेस्ट 18 मार्च की स्थितियों पर होना चाहिए।

विनियोग विधेयक के पास नहीं होने की बात केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली तक ने कही। इस बीच राजभवन ने 23 मार्च को दोबारा नेता सदन हरीश रावत को पत्र लिखकर जल्द फ्लोर टेस्ट करवाने की बात तो कही, लेकिन कांग्रेस के आए जवाब से मुतमईन होकर उन्होंने अपना 28 को फ्लोर का फैसला बरकरार रखा।

उधर, कांग्रेस ने तय कार्यक्रम के हिसाब से बागियों को दल बदल कानून के तहत बर्खास्त कर दिया। ऐसे में 27 मार्च को केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लगाकर राज्यपाल के फ्लोर पर उतरने के निर्णय को रोक दिया।
विज्ञापन

हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कांग्रेस का वही रुख

नैनीताल उच्च न्यायालय - फोटो : ‌file photo
कांग्रेस ने हाईकोर्ट की सिंगल बेंच से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपना वही रुख रखा, जो राजभवन के सामने 18 मार्च को रखा था। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर 10 मई को फ्लोर टेस्ट हुआ।

विनियोग विधेयक सहित बागियों की बर्खास्तगी का विरोध हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक सुना गया, लेकिन वह फ्लोर टेस्ट के लिए गैरजरूरी माना। इन मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट अलग से सुनवाई करेगा। लगभग दो माह तक चले सियासी घटनाक्रम के बाद वही हुआ, जो पहले दिन तय था। कांग्रेस ने दस विधायक खोकर भी फ्लोर टेस्ट पास कर लिया, जबकि भाजपा के हाथ किरकिरी लगी।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें