आपदा की मार झेल रहे रुद्रप्रयाग में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बुरा है। जिला अस्पताल सहित दो सीएचसी और एक पीएचसी रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं। इन तीनों अस्पतालों में वर्षभर औसतन एक लाख ओपीडी पंजीकृत हो रही हैं। जबकि अकेले जिला अस्पताल में सालभर में 15 हजार मरीज भर्ती हो रहे हैं, जिसमें 75 फीसदी रेफर किए जा रहे हैं।
जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों के 21 पदों के सापेक्ष सिर्फ नौ डाक्टर कार्यरत हैं, जिसमें पांच विशेषज्ञ हैं। सुरक्षा की दृष्टि से अस्पताल में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। अस्पताल में सफाई सर्वोपरि होनी चाहिए, वही यहां नहीं है।
टायलेट और बाथरूम से आती बदबू मरीजों को बेहाल करती है। पोस्टमार्टम हाउस के तरफ तो स्थिति और भी खराब है। यहां अस्पताल के वार्डों की गंदगी रास्ते में फैली हुई है।
किराये के भवनों में चल रहे केंद्र
जिले में 12 अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 22 एलोपैथिक केंद्र और 70 सब सेंटर हैं। इन केंद्रों में मेडिकल स्टाफ के अलावा संसाधनों का भी टोटा है। स्थिति यह है कि स्वास्थ्य विभाग के 12 से अधिक केंद्र किराये के भवनों पर हैं। वहीं इतने ही पंचायत भवन व अन्य भवनों पर संचालित हो रहे हैं। दूसरी तरफ भीरी में अस्पताल भवन का निर्माण होने के बाद भी इसका संचालन नहीं हो रहा है।
बर्न वार्ड नहीं
जिला अस्पताल में बर्न वार्ड की सुविधा नहीं होने से यहां आग से झुलसे मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद सीधे रेफर किया जाता है। फरवरी में धनपुर के पाबौ गांव की वनाग्नि से झुलसी तीन किशोरियों को यहां से रेफर किया गया था। इनमें दो की बाद में देहरादून के अस्पतालों में मौत हो गई थी। जिले में छह माह में छह बर्न केस हुए हैं, जो रेफर किए गए।
अल्ट्रासाउंड मशीन बनी शोपीश
जिला अस्पताल में पांच वर्ष से रेडियोलॉजिस्ट का पद रिक्त होने से अल्ट्रासाउंड जंग खा रही है। जबकि यहां औसतन प्रतिदिन 50 मरीज अल्ट्रासाउंड के लिए पहुंचते हैं। इन हालात में उन्हें प्राइवेट क्लीनिकों में तीन गुना अधिक दाम पर अपनी जांच करानी पड़ रही है।
केदारघाटी में हाल और भी बुरे
केदारघाटी में स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर एक पीएचसी ऊखीमठ और एसएडी गुप्तकाशी है, लेकिन इन केंद्रों में कई बार बुखार की दवा तक नसीब नहीं होती है। खून जांच से लेकर रक्त जांच के लिए घाटी के लोगों को रुद्रप्रयाग की दौड़ लगानी पड़ती है।