शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम ने कहा कि विश्वव्यापी अर्थसंकट के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था महिलाओं के धन और गुल्लकों से सुधरी थी। आपातकाल और आकस्मिक खर्चों के लिए धन रखना लोगों का अधिकार है। देश के सारे धन को कालाधन नहीं माना जा सकता।
मंगलवार को कनखल के जगद्गुरु आश्रम में अमर उजाला से बातचीत में जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि भारतवासी अति प्राचीन काल से संकट काल के लिए आर्थिक सुरक्षा करते आए हैं। परिवार पर अचानक कोई आपदा न आ जाए, इस डर से लोग अपने घरों में धन जमा रखते हैं। महिलाएं भी अपने पास मुसीबत के समय काम आने वाला धन रखती हैं। यह धन कालाधन नहीं है। यह तो सुरक्षाधन है। इस धन पर घर का अधिकार है। जगद्गुरु ने कहा कि कुछ वर्ष पहले जब समूचा विश्व आर्थिक संकट में डूब गया था, तब भारत को घरों में सुरक्षित इसी धन ने बचाया था। शहरों में ही नहीं देश के गांवों में भी किसान महिलाओं के पास कुछ सुरक्षित धन था। संकट के समय बच्चों की गुल्लक तोड़कर काम चलाया जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ यह घरेलू धन रहा है। इस धन पर घरवालों का अधिकार है।
शंकराचार्य स्वामी राजराजेश्वराश्रम ने कहा कि भारत की प्राचीन अर्थव्यवस्था बहुत समृद्ध थी। कौटिल्य आदि अनेक अर्थशास्त्रियों ने भारतीय अर्थशास्त्र पर चिंतन किया। यह अर्थव्यवस्था बचत की अर्थव्यवस्था है। लक्ष्मी का रंग कभी काला नहीं होता। लक्ष्मी तो आराधना कर मांगी जाती है। देश के करोड़ों लोग दीपावली पर विधिवत लक्ष्मी की आराधना करते हैं। उन्होंने कहा कि यूं तो देश की समूची मुद्रा में काली स्याही का उपयोग होता आया है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह धन काला हो जाए। वर्तमान दौर में छिपे धन को बाहर निकालने के साथ घरेलू अर्थव्यवस्था को जोड़ देना उचित नहीं है। देश तभी आर्थिक रूप से समृद्ध रह सकता है, जब बचत की रणनीति अपनाई जाए। आपातकालीन धन से देश की अर्थव्यवस्था सुचारु रूप से चल रही थी। जो लोग अनुचित मुनाफे लेकर भारी धन एकत्रित करते हैं, कार्रवाई केवल उनके खिलाफ होनी चाहिए।