नगर निगम का कूड़ा उठाने का काम लगातार कम हो रहा है, लेकिन कूड़ा वाहनों के तेल की खपत बढ़ती जा रही है।
नगर निगम एक बार फिर बढ़ते तेल खर्च को लेकर सुर्खियों में है। ऑफ सीजन जनवरी जब कूड़ा कचरा कम होता है और यात्रा सीजन मई-जून, जुलाई जब कूड़ा कचरा अधिक जनरेट होने पर भी कूड़ा गाड़ियों का तेल का खर्च लगभग बराबर दिखाया जा रहा है। वर्ष 2014-15 में तत्कालीन नगर आयुक्त ने सख्ती कर तेल खर्च के चोर दरवाजे बंद कर तेल का खर्च प्रतिमाह 6 लाख रुपये पर ला दिया था। तब नगर गिनम 15 वार्डों में कूड़ा उठाने का काम कर रहा था। कूड़ा गाड़ियों को जीपीएस सिस्टम से जोड़ने के साथ ही कूड़ा गाड़ियों के तेल टैंक पर ताला लगवा दिया गया था।
तत्कालीन नगर आयुक्त के तबादले के साथ ही कूड़ा गाड़ियों जीपीएस सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया और गाड़ियों के तेल टैंकों पर लगे ताले गायब कर दिए गए हैं। जिसका नतीजा यह है कि अब जब नगर निगम केवल आठ वार्डों में कूड़ा उठाने का काम कर रहा है तो उसका प्रतिमाह तेल का खर्च प्रतिमाह 7 से 8 लाख रुपये को पार करने लगा है। जबकि तेल का खर्च घटकर प्रतिमाह 5 लाख रुपये के आसपास आना चाहिए था। इसका मतलब साफ है कि तेल में लाखों रुपये प्रतिमाह का बड़ा खेल किया जा रहा है। बढ़ते तेल खर्च ने अधिकारियों के माथे पर बल डाल दिए हैं।
जांच होने तक दो अधिकारी करेंगे निगरानी
तेल का खर्च बढ़ने के कारणों की जांच और नियंत्रित करने के उपाय सुझाने के लिए जनवरी में नगर निगम अधिशासी अभियंता दिनेश शर्मा के नेतृत्व में जांच समिति गठित कर दी गई थी। ओएसडी पीएस रावत ने बताया कि बृहस्पतिवार को भी नगर आयुक्त ने इस विषय पर अधिकारियों ने वार्ता की और जांच पूरी होने तक सहायक नगर अधिकारी व मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी निगरानी करने को निर्देशित किया है। जांच अधिकारी ने भी स्वास्थ्य विभाग से तीन साल का तेल खपत का विवरण तलब किया कर लिया है। नगर आयुक्त ने यह भी निर्देश दिया है कि नगर निगम का जो अधिकारी गाड़ी का उपयोग करेगा, ड्राइवर को तेल की पर्ची भी वही अधिकारी देगा।