केंद्र के साथ ही उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा की भारी बहुमत वाली सरकार बनने से उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के बीच परिसंपत्तियों के बंटवारे की राह आसान हो गई लगती है। यह संयोग है कि 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश राज्य का पुनर्गठन कर अलग उत्तराखंड बनाया गया था। उस समय भी केंद्र तथा उत्तर प्रदेश में भाजपा की ही सरकार थी और उत्तराखंड में बनी अंतरिम सरकार भी भाजपा की थी। तब परिसंपत्तियों की हिस्सेदारी का मामला ब्यूरोक्रेसी के भरोसे छोड़ दिया गया। उत्तराखंड के अफसर कभी भी यूपी के अफसरों से हक के लिए अड़े नहीं। अब 16 साल बाद एक बार फिर वही स्थिति बनने का योग आया है। केंद्र के साथ ही दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है। ऐसे में उत्तराखंड अपना हक मिलने की उम्मीद कर सकता है। परिसंपत्तियों के साथ ही पानी में राज्य की हिस्सेदारी भी बहुत बड़ा मुद्दा है। इसको हल नहीं किया गया तो पानी में हिस्सेदारी का मसला आगे दक्षिण का कावेरी जैसा जल विवाद का रुप ले लगा।
16 साल बाद भी नहीं मिला हक
पूर्व सभासद दिनेश जोशी ने कहा कि उत्तराखंड को 16 साल बाद भी उसका हक नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के अधिकारियों ने दिसंबर में 25 प्रतिशत संपत्तियां लेने का जो समझौता किया है वह राज्य हित में नहीं हैं। प्रदेश सरकार को तत्काल इस समझौतों का निरस्त करना चाहिए। अब चूंकि हाईकोर्ट ने भी संपत्तियों के बंटवारे की समय सीमा तय कर दी है इसलिए उत्तराखंड केेे राजनीतिक नेतृत्व को राज्य को उसका हक दिलाना चाहिए। इससे पूर्व 2009 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उत्तराखंड की सीमा के अंदर की परिसंपत्तियों को उत्तराखंड के राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने का आदेश दिया था। जिसके खिलाफ उत्तर प्रदेश सुप्रीमकोर्ट गया था और सुप्रीमकोर्ट ने स्टेट्स को बनाए रखने तथा केंद्र सरकार को मध्यस्थता कर दोनों राज्यों के बीच संपत्तियों को बंटवारा करने का आदेश दिया था। जिस पर कुछ किया नहीं गया है।
इस समझौते से पानी का संकट होगा
उत्तराखंड के सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश के कब्जे की परिसंपत्तियों में से 25 प्रतिशत लेने का समझौता किया है। इसमें उत्तराखंड को ऊधमसिंह नगर व हरिद्वार की 39 नहरें भी शामिल हैं। इनमें 28 नहरें हरिद्वार में हैं। सबसे खतरनाक यह है कि उत्तर प्रदेश ने नहरों को हेड से 100 मीटर की दूरी से उत्तराखंड को देना तय किया है। उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने जाते-जाते दिसंबर में शासनादेश जारी भी कर दिया था। भाजपा सरकार का उत्तराखंड विरोधी निर्णय को निरस्त कराना चाहिए।
उत्तराखंड राज्य की सीमा के अंदर की परिसंपत्तियां उत्तराखंड को मिलनी ही चाहिए। हम उत्तराखंड के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होने देंगे। दोनों राज्यों के अधिकारियों ने जो समझौता किया है उसकी समीक्षा की जाएगी। - मदन कौशिक कैबीनेट मंत्री