हरिद्वार। हरिद्वार शहर सहित ग्रामीण इलाकों में भी शनिवार को हरेला पर्व की धूम रही। इस दौरान समस्त जिले में वन प्रभाग, विभिन्न स्वयंसेवियों संस्थाओं सहित विद्यालयों द्वारा भी पौधरोपण किया गया।
शनिवार को हरिद्वार में हरेला पर्व के अवसर पर पौधरोपण किया गया। जिलाधिकारी ने अभियान की शुरुआत अपने कैंप कार्यालय में पौधरोपण कर की। कई अन्य संस्थाओं ने भी पौधरोपण के दौरान कनेर, हरश्रंगार, आंवला, गुडहल, पीपल, बरगद, मौलरी, सावनी व नीम आदि पौधे जगह-जगह लगाए। वन प्रभाग ने हरिद्वार रेंज, चिड़ियापुर, श्यामपुर, रुड़की, लक्सर, खानपुर व रसियाबड़ रेज में पौधरोपण किया। डीएफओ एचके सिंह व उप प्रभागीय वनाधिकारी संतराम, हरिद्वार के रेंजर महेश प्रताप सेमवाल व पूर्व विधायक अम्बरीश कुमार ने ज्वालापुर इंटर कॉलेज, सरस्वती विद्या मंदिर मायापुर, हरिराम आर्य इंटर कालेज, बहादराबाद स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय में 400 पौधे लगाकर हरेला पर्व मनाया। सरस्वती शिशु मंदिर में हरेला पर्व पर पौधरोपण किया गया। प्रधानाचार्य करनेश कुमार सैनी ने छात्रों को वृक्षों का दोहन न करने की कसम खिलाई। हिंदू जागरण मंच ने डा. हरिराम आर्य इंटर कॉलेज में पौधरोपण किया। मंच के सह संगठन मंत्री भगवान सिंह ने बताया कि संगठन 16 जुलाई से 5 अगस्त तक समूचे प्रदेश में हरेला पर्व के तहत पौधरोपण करेगा। सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज मायापुर ने चंडी घाट पर 500 पौधे लगाकर हरेला पर्व मनाया। प्रधानाचार्य डा. विजय पाल सिंह ने कहा कि पर्यावरण की रक्षा को अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए। वहीं सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज सेक्टर दो में हरेला पर्व पर मां सस्वती वंदना के गायन के बाद कार्यक्रम की शुरुआत की गई। प्रधानाचार्य गणेश जोशी ने पर्यावरण रक्षा की शपथ दिलाई। इस मौके पर कुलभूषण सक्सेना, जगदीश लाल पहवा, फूल सिंह, हितेश कुमार, तस्लीम अंसारी, ओपी सिंह, तीसपाल, अजय सिंह, भूपेंद्र सिंह, शैलेंद्र रतूड़ी, मोहन जोशी, राकेश शर्मा, भुवन चंद्र, भूपेंद्र सैनी, आर्यन उपाध्याय, विनीत चौहान, स्वतंत्र सैनी, आदेश भार्गव, रजनीश कटारिया, राम प्रकाश, प्रवीण रुद्रप्रताप, ब्रजेश कुमार व अशोक कुमार आदि शामिल रहे।
क्या है हरेला पर्व
हरेला उत्तराखंड के परिवेश और खेती के साथ जुड़ा हुआ पर्व है।
यह सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और दस दिन बाद श्रावण के प्रथम दिन काटा जाता है। वहीं तीसरी बार आश्विन मास में नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है। किंतु उत्तराखंड में श्रावण मास में पड़ने वाले हरेला को ही अधिक महत्व दिया जाता है! क्योंकि श्रावण मास शंकर भगवान को विशेष प्रिय है। सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूं, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 4 से 6 इंच लंबे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हरेला बोया व काटा जाता है। इसके मूल में यह मान्यता निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा, उतनी ही फसल बढ़िया होगी। साथ ही प्रभु से फसल अच्छी होने की कामना भी की जाती है।