करीब छह दशक बाद गऊ घाट एक बार फिर गायों से आबाद हो सकता है। कुशावर्त घाट में कर्मकांड में बाधक बनी गायों को हटाने की तैयारी शुरू हो गई है। इसका बीड़ा प्रबंधकारिणी संस्था गंगा सभा ने उठाया है। नगर निगम के मेयर ने भी इस पर अनापत्ति जताई है।
सुभाष घाट और कुशावर्त घाट के बीच शताब्दियों से गऊ घाट स्थित था। उस समय यहां सैकड़ों गाय रहती थी और आने वाले तीर्थयात्री उन्हें चारा आदि खिलाते थे। पितृ कर्मकांड के बाद इसी घाट पर गाय दान होती थी। गंगा नहर की शताब्दी मनाए जाने की खुशी तथा अर्द्धकुंभ के लिए वर्ष 1956 में इस स्थल पर गंगा पार से शताब्दी पुल बनाया गया । चूंकि पुल का उतार रोड़ीबेलवाला से गऊ घाट पर होने से वहां रहने वाली गायों को कुशाघाट पर भेज दिया गया। तब से कर्मकांड के लिए अधिकृत कुशावर्त घाट पर गायों का कब्जा है। इस घाट पर प्रतिदिन सैकड़ों तीर्थयात्री देवों तथा पितरों का कर्मकांड करने आते हैं। यहां रहने वाली गाय और उन्हें परोसे जाने वाला चारा कर्मकांड में बाधा बने हुए हैं।
अब हर की पैड़ी तथा कुशावर्त की प्रबंधकारिणी संस्था गंगा सभा ने गऊघाट को मूल स्थान पर ले जाने की मुहिम शुरू कर दी है। मेयर मनोज गर्ग ने भी इस पर सहमति जताई है। गंगा सभा के महामंत्री रामकुमार मिश्रा ने बताया कि गऊघाट की काफी जगह यद्यपि फूल फरोशों ने घेर ली है, किंतु पुल के नीचे अब भी काफी जगह है। उत्तराखंड सिंचाई विभाग से संपर्क साधा गया है कि वह गऊघाट के लिए जगह खाली कराए। गंगा सभा इसके लिए लिखा पढ़ी शुरू कर चुकी है। गऊघाट स्थापित होने से कुशावर्त घाट पर सैकड़ों लोगों के लिए कर्मकांड का नया स्थान उपलब्ध हो जाएगा।