सोलह दिनों के श्राद्ध शुक्रवार को संपन्न हुए। देशभर से आए लाखों श्रद्धालुओं ने गंगातट पर तर्पण कर पितरों को विदाई दी। सायंकालीन सूर्य किरणों पर सवार होकर पितृ दक्षिण दिशा स्थित अपने महालय लोक लौट गए। मार्ग प्रशस्त करने के लिए दिन ढलते समय श्रद्धालुओं ने गंगातट पर दीप जलाए।
शुक्रवार को श्रद्धालुुओं ने सबसे पहले हरकी पैड़ी और अन्य घाटों पर डुबकी लगाई। दिन निकलने से पूर्व ही लाखों श्रद्धालु कुशावर्त और नारायणी शिला पहुंच गए। नारायणी शिला पर यह आलम था कि तड़के पांच बजे ही तिल रखने की जगह नहीं बची थी। परिणाम स्वरूप श्रद्घालु नगर निगम परिसर, मुख्य मार्ग व गणेश घाट तक बाहर ही श्राद्घ करने लगे। नारायणी शिला पर दर्शन के लिए लंबी कतारें लगी रही। इस शिला के विशाल प्रांगण में श्रद्धालुुओं ने अपने-अपने पितरों की स्मृति में चिन्ह भी स्थापित किए। इस स्थल पर कालसर्प योग का निवारण करने वालों की भी काफी भीड़ थी। पितृ विसर्जन के साथ-साथ श्रद्धालुुओं ने नारायणी कर्म भी संपन्न भी कराया।
कुशावर्त पर भी भारी भीड़ । बाहर के समूचे मैदान के साथ-साथ गऊघाट तक श्राद्घ तर्पण चल रहा था। विशेष प्रबंध न होने के चलते हुए घाट पर अफरा तफरी मची रही। लोगों ने श्राद्घ कर्म तो कर लिया, किंतु पिंडों को गंगा में विसर्जित करने के लिए जाने की जगह नहीं मिली। भीड़ के चलते गंगा पार स्थित रोड़ी मैदान में भी श्रद्धालुुओं ने श्राद्ध तर्पण किया। लोगों ने अपने घरों में दोपहर के समय ब्राह्मणों को पितृ निमित्त भोजन कराकर यथोचित दान दक्षिणा दी। सायंकाल श्रद्धालुुओं ने गंगा तट पर जाकर दीप जलाए। पितृ निमित्त दीप यज्ञ गंगा के साथ-साथ गंगनहर पर भी चला।