अजीब बात है कि हरिद्वार और रुड़की जैसे शहरी क्षेत्र के प्राइमरी स्कूलों में अधिकांश शिक्षकों के पद रिक्त हैं। जबकि जिले भर में 20 से ज्यादा शिक्षक स्कूलों में पढ़ाने के बजाए दफ्तरों में बाबूगिरी में व्यस्त हैं। शासन से सभी अटैचमेंट रद्द होने के बावजूद शिक्षकों को दफ्तरों से स्कूलों में नहीं भेजा गया।
सरकारी स्कूलों की बदहाली के लिए सिस्टम के साथ-साथ कुछ शिक्षकों की गैरजिम्मेदारी भी जिम्मेदार है। जहां ज्यादातर शहरी क्षेत्रों में शिक्षकों में पोस्टिंग के लिए मारामारी रहती है, वहीं हरिद्वार और रुड़की जैसे शहर शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। शहरी क्षेत्र के ज्यादातर स्कूल एक- एक शिक्षक के भरोसे हैं। वहीं दूसरी तरफ शिक्षक स्कूलों के बजाय विभाग के दफ्तरों में मौज काट रहे हैं। प्राइमरी और उच्च प्राइमरी स्कूलों के कई शिक्षक तो ऐसे हैं जिन्होंने नौकरी ज्वाइन करने के बाद स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। शासन की सख्ती के बावजूद एक दशक से ज्यादा समय से ऐसे कई शिक्षक दफ्तरों में कुंडली जमाए हुए हैं।
बीआरसी, सीआरसी, उप शिक्षा अधिकारी दफ्तरों से लेकर विभाग के जिला स्तरीय अधिकारियों के दफ्तरों में शिक्षक अटैच चल रहे हैं। विभागीय सूत्रों के मुताबिक ऐसे शिक्षकों की लंबी फेहरिस्त हैं जो अपनी मूल तैनाती के बजाय दूसरी जगहों पर अटैच हैं। बहादराबाद के अलावा रुड़की, लक्सर, खानपुर, भगवानपुर व नारसन ब्लॉक में भी यही हाल हैं। कई शिक्षक ऐसे भी हैं, जिनका अटैचमेंट तत्कालीन शिक्षा महानिदेशक डी सेंथिल पांडियन ने रद्द किया था। बावजूद वह बाबूगिरी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। वहीं प्रभारी डीईओ बेसिक दिनेश चंद्र डिमरी का कहना है कि इस बारे में रिपोर्ट ली जाएगी। शिक्षकों को निश्चित तौर पर उनके मूल तैनाती स्थल पर भेजा जाएगा।
बाबू का ग्रेड कम, फिर भी मगन
शिक्षक बाबूगिरी में इस कदर मगन हैं कि निचले ग्रेड की भी कोई चिंता नहीं है। बाबू का ग्रेड शिक्षक से कम होता है, लेकिन कई शिक्षकों पर बाबूगिरी का शौक इस कदर हावी है। इसके लिए हजार बहाने हैं और सिफारिशों की भी कमी नहीं है।
अटैचमेंट व्यवस्था पूरी तरह खत्म की जा चुकी है। इसके बावजूद कहीं कोई शिक्षक अटैच है तो यह गंभीर बात है। इस बारे में जिला शिक्षा अधिकारी से रिपोर्ट लेकर एक्शन लिया जाएगा।- महावीर सिंह बिष्ट, अपर शिक्षा निदेशक उत्तराखंड