‘डीएम सर! हमारे स्कूल में दो साल से बच्चों के स्वास्थ्य की जांच नहीं हुई। कई बच्चे बीमार हैं, गांव में भी डाक्टर नहीं है। अत: आप कृपया स्कूल में डाक्टर भेजकर बच्चों के स्वास्थ्य की जांच करा दो।’ एक सरकारी स्कूल के पांचवीं कक्षा के छात्र ने जिलाधिकारी को चिट्ठी लिखकर न सिर्फ अपने स्कूल और गांव की व्यथा सुनाई है, बल्कि कागजों में चल रहे राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की पोल भी खोल दी है। हाल यह है कि तमाम स्कूलों में पिछले कई वर्षों से बच्चों का स्वास्थ्य नहीं जांचा गया।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत स्कूल मेें साल में दो बार बच्चों का स्वास्थ्य चेकअप कराया जाता है। जांच में बीमारी सामने आने पर मुफ्त इलाज की भी व्यवस्था है। दो साल पहले तक प्राइमरी स्कूलों में बच्चों के स्वास्थ्य जांच को लेकर गंभीरता दिखाई गई, लेकिन बाद से अधिकांश स्कूलों में चेकअप नहीं हुआ। राजकीय प्राइमरी स्कूल टाटवाला के पांचवी कक्षा के छात्र विपुल कुमार ने जिलाधिकारी को चिट्टी लिखकर विभागों को नींद से जगाने का प्रयास किया है। विपुल की डीएम को लिखी चिट्ठी पर हिमांशी, नैना, ललिता, साक्षी, अरुण, पुनीत, विशाल, रोहित, मोहित, सूरज, मानसी, आंचल, पायल, नीरज, पूजा, सूरज, विशाल, शिवा, अरुण, अंजली, गौरव, अन्नू, गौतम आदि छात्र- छात्राओं के हस्ताक्षर हैं। चिठ्ठी में गांव में डाक्टर नहीं होने की मजबूरी बताते हुए बच्चों के चेकअप की अपील की गई है।
डीएम ने बोला था, कोई परेशानी हो तो बताना
पांचवी के छात्र विपुल ने यूं ही जिलाधिकारी को चिट्टी नहीं लिखी। कुछ दिन पहले डीएम उनके स्कूल में आए थे। तब बच्चों से बातचीत में उन्होंने कहा था कि कोई परेशानी हो तो बताना। इस बात का जिक्र विपुल ने अपनी चिट्ठी में भी किया है। दरअसल स्कूल के कई बच्चे बीमार चल रहे हैं। कक्षा मेें बैठे विपुल को डीएम की बात याद आई और उसके मन में चिट्ठी लिखने का ख्याल आया। उसने अपने शिक्षक शिवा अग्रवाल से पूछा कि क्या वह डीएम को चिट्ठी भेज सकता है। जिस पर शिवा अग्रवाल ने उसका उत्साह बढ़ाते हुए भरोसा दिलाया कि वह उसकी चिट्ठी डीएम तक जरूर पहुंचाएंगे। शिक्षक शिवा अग्रवाल ने बताया कि जल्द ही चिट्ठी जिलाधिकारी को सौंप दी जाएगी।
शहर के स्कूलों में भी जांच नहीं
शहरी क्षेत्र के स्कूलों में भी बच्चों के स्वास्थ्य की जांच लंबे समय से नहीं हुई है। ऐसे में देहात व दुर्गम के स्कूलों में बच्चों के स्वास्थ्य जांच की उम्मीद कैसे की जा सकती है। बच्चे ने अपने स्कूल के साथ ही गांव में चिकित्सा सेवा की धुंधली तस्वीर पेश की है, मगर टाटवाला ही नहीं यह हाल जिले के तमाम स्कूलोंबीञर गांव का है। एक मासूम की पेंसिल से लिखी गई चिट्ठी सिस्टम को आइना दिखाती है।