अक्षय तृतीया के पर्व पर देशभर से आए श्रद्धालुओं ने गंगा में पवित्र डुबकी लगाई और धार्मिक कर्म कराए। इस अवसर पर मठ, मंदिरों, आश्रमों और पुरोहितों की गद्दियों पर जाकर दान दिया गया। मान्यता है कि आज के दिन किए गए शुभ कर्म कभी भी विफल नहीं जाते। श्रद्घालुओं ने लक्ष्मीनारायण के मंदिरों में जाकर आरती उतारी और प्रसाद चढ़ाया।
गंगा स्नान के बाद श्रद्घालुओं ने यज्ञोपवीत, मुंडन, कर्ण छेदन आदि अनेक संस्कार संपन्न कराए। आज के दिन कई स्थानों पर अनसुझाए विवाह हुए। यह पर्व सिद्घ पर्व माना गया है। इस पर्व पर अनेक व्यवसायिक प्रतिष्ठानों का शुभारंभ भी किया गया। श्रद्घालुओं ने लक्ष्मी नारायण कथाओं का श्रवण गंगा तटों पर बैठकर किया। हरकी पैड़ी पर होने वाली कथा में पर्व की महत्ता का व्याख्यान पंडितों द्वारा किया गया। तृतीया पर यज्ञ भी हुए। अनेक श्रद्घालुओं ने पितरों के निमित्त तर्पण किया। कुछ शिव मंदिरों में तर्पण का विशेष आयोजन किया गया था। पंचुपरी के जिन भी मंदिरों में लक्ष्मी और विष्णु की प्रतिमाएं हैं, उन सभी का पुजारियों ने भव्य श्रृंगार किया। भगवान विष्णु के कई अवतार आज के दिन हुए थे। उनके छठे अवतार परशुराम थे, जिनकी जयंती श्रद्घा पूर्वक मनाई गई। इस दिन पंडितों ने नए यज्ञोपवीत धारण किए और कुशाओं से हेमाद्रि संकल्प लिया।