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Haridwar News: शिवरात्रि पर शिवालयों में उमड़ी भक्तों की भीड़

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- हर-हर महादेव के जयकारों के साथ संपन्न हुआ 12 दिवसीय कांवड़ मेला
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- दक्षेश्वर महादेव और बिल्वकेश्वर मंदिर समेत अन्य शिवालयों में बड़ी संख्या में पहुंचे भक्त
माई सिटी रिपोर्टर
हरिद्वार। 12 दिवसीय कांवड़ मेला सावन की शिवरात्रि पर संपन्न हो गया। मंगलवार को दक्षेश्वर महादेव मंदिर कनखल और बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर हरिद्वार समेत सभी शिवालयों में भारी भीड़ उमड़ी। श्रद्धा के साथ स्थानीय और कांवड़ यात्रियों ने महादेव का जलाभिषेक किया।
कांवड़ यात्री धर्मनगरी के शिवालयों में जलाभिषेक कर अपने गंतव्य की ओर लौटे, जहां पर वह कांवड़ के जल के साथ सपरिवार जलाभिषेक करेंगे। नीलेश्वर महादेव, गौरीशंकर समेत अन्य प्रसिद्ध शिव मंदिरों में सुबह 4 बजे से ही लंबी-लंबी लाइनें लग गईं। इन मंदिरों में पहुंचकर श्रद्धालुओं ने हर हर महादेव के जयकारे के साथ भोलेनाथ का जलाभिषेक किया।
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दरिद्र भंजन महादेव मंदिर, दुख भंजन महादेव मंदिर और तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर सहित कई शिवालयों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने जलाभिषेक किया। भक्तों ने भगवान भोलेनाथ से सुख-समृद्धि की कामना की। हालांकि, सावन मास का मेला अभी जारी रहेगा। भगवान शिव का पूजन रक्षाबंधन तक चलेगा।
यह पर्व 28 अगस्त को है। महानिर्वाणी पंचायती अखाड़ा के सचिव महंत रवींद्रपुरी महाराज ने कहा कि भगवान शिव कनखल स्थित अपने ससुराल दक्षेश्वर महादेव मंदिर में एक महीने तक विराजमान रहते हैं। वे यहां भक्तों का कल्याण करते हैं।
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बिल्वकेश्वर मंदिर का पौराणिक महत्व
बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भोलेनाथ का जलाभिषेक किया। यह स्थल शिव और पार्वती के मिलन का केंद्र माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह देवी पार्वती की तपस्या स्थली है। उन्होंने इस स्थान पर पांच हजार वर्ष तक कठोर तपस्या की थी। उनकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए। इसी स्थल पर शिव ने पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। यह मंदिर पार्वती और भगवान शिव के मिलन का प्रमुख केंद्र है। यह स्थान अत्यंत पौराणिक है। यहां एक स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। भक्तों की इसमें गहरी आस्था है।
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नीलधारा पर स्थित मंदिर का महत्व नीलकंठ मंदिर के समान
चंडी देवी मंदिर से आगे नीलधारा तट के ऊपर स्थित नीलेश्वर महादेव की महिमा अपरंपार है। दुख, दरिद्र और दुर्गुण को दूर करने वाले इस महादेव की महिमा नीलकंठ मंदिर से जुड़ा है। महादेव ने विषपान करने के बाद यहीं से नीलकंठ के लिए प्रस्थान किया। विष की तपिश में रहते हुए महादेव ने नीलकंठेश्वर के रूप में तपस्या की। इस मंदिर से ठीक नीचे गौरीशंकर महादेव मंदिर है, जिसे जनवासा भी कहा जाता है। मान्यता है कि माता सती के साथ महादेव ने इसी मंदिर में विश्राम किया था। जनवासा का अर्थ यह है कि यहीं स्थान है जहां से भगवान भूतनाथ दक्ष सुता माता सती को ब्याहने आए तो उनकी बारात इसी स्थान पर रुकी थी। इन पौराणिक मान्यताओं के स्थलों पर भक्तों ने मां गंगा से जल लेकर महादेव का अर्पित किया। उनसे सुख-समृद्धि की कामना कर अपने-अपने गंतव्य की ओर रवाना हुए।
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