हरिद्वार। सरकार की उपेक्षा से महत्वपूर्ण पुरास्थल अस्तित्व खोता जा रहा है। अनुमान है कि यह शिव मंदिर आठवीं से 10वीं शती के बीच बनाया गया होगा। स्कंद पुराण में षोडेश्वर महादेव नाम से इसका वर्णन मिलता है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि मंदिर के पुजारी यहां बड़ा खजाना दबा होने की आशंका में गुपचुप खुदाई करवाते रहते हैं। जबकि इस संबंध में पुजारी संतराम का कहना है कि वह तो मंदिर की सफाई करवा रहे हैं। खुदाई से निकला मलबा आसपास पड़ा दिखता है।
हरिद्वार-बिजनौर राजमार्ग पर श्यामपुर से थोड़ा आगे एक बोर्ड पर कुंडी सोटेश्वर मंदिर का बोर्ड लगा हुआ है। कुछ सीढ़ियां चढ़ने पर मंदिर के बाहर एक बड़ा आमलक और इसके ऊपर एक काले रंग का शिवलिंग उलटा करके रखा हुआ है। पुजारी संतराम आमलक को कुंडी और शिवलिंग को सोटा के रूप में व्याख्या करके इसका नाम कुंडी सोटेश्वर बताते हैं। करीब एक हेक्टेयर से अधिक में फैले इस टापू पर जहां-तहां प्राचीन मंदिर के अवशेष बिखरे हुए हैं। यहां एक छोटा तालाब है और अक्सर हाथी पानी पीने आते हैं। इस तालाब को भी कुुंड या कुंडी के रूप में जोड़कर देखा जाता है। इसके पास एक नया मंदिर बनाया गया है। जिसमें एक काले रंग का बड़ा शिवलिंग रखा गया है। यह दोनों शिवलिंग धराशायी हो चुके प्राचीन शिव मंदिर के हैं। छोटे-बड़े कई तरह के दर्जनों आमलक, गणेश और देवी की मूर्तियां भी सहेज कर रखी गई हैं। पास में एक दर्जन से अधिक खंभो के नीचे के भाग मंदिर के विराट और भव्य होने की ओर इशारा करते हैं। मंदिर की नींव की दीवारें कई फीट गहरी और चार से पांच फुट मोटी हैं। दीवारों से निकली ईंटों की लंबाई 37 सेंटीमीटर, चौड़ाई 22 और मोटाई साढ़े सात सेंटीमीटर है। जो भी साफ सफाई अभी तक यहां की गई उससे पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं नष्ट हो रही है।
इनका कहना है
मंदिर के अवशेष, निर्माण में लगी सामग्री और ईंटों की नाप के आधार पर कहा जा सकता है कि यहां सातवीं से दसवीं शती में भव्य शिव मंदिर रहा होगा। अभी भी आसपास कई छोटे मंदिर दबे हो सकते हैं। पूरे टापू की खुदाई कराई जाए तो एक सभ्यता का पता लग सकता है।
-धीरेंद्र शर्मा, पुरातत्वविद् और भारतीय पुरातत्व विभाग के पूर्व अधिकारी।
सरकार को इस स्थल की खुुदाई करानी चाहिए। कुछ नए तथ्य निकलकर सामने आ सकते हैं। मंदिर का वास्तविक कालानुक्रम ज्ञात होने से किसी भी तरह के भ्रम दूर होने में मदद मिलेगी।
-मनोज कुमार, क्यूरेटर संग्रहालय, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार।
स्कंद पुराण के अनुसार यहां बिल्ब का जंगल था। कुंड के पास षोडेश्वर नाम का भव्य शिव मंदिर और काले रंग के शिवलिंग का आख्यान मिलता है। लगभग एक हजार साल पुरानी बात रही होगी।
-एचटी बेकर, एमराईटस प्रोफेसर संस्कृत एवं हिंदुत्व तथा क्यूरेटर ईआरसी ब्रिटिश म्यूजियम लंदन एवं स्कंद पुराण के विशेषज्ञ।
कुंडी सोटेश्वर मंदिर ही नहीं चंडीदेवी के नीलेश्वर पर्वत से गंगा किनारे बिजनौर तक उत्खनन कराया जाना चाहिए। चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान का सिल्कमार्ग यहीं से निकलता था। प्राचीन सभ्यताओं के कई प्रमाण निकलकर समाने आएंगे।
-प्रो.देवेंद्र कुमार गुप्ता, प्राचीन भारतीय इतिहास,संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग,गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार।
हमारे पास टेक्निकल स्टॉफ (अन्वेषण सहायक) उपलब्ध नहीं है। पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी है। पहले से उत्खनित और संरक्षित साइट्स को भी संभालना भारी पड़ रहा है।
-आशीष कुमार, सहायक निदेशक, कला संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग उत्तराखंड।