वैशाखी पर मंगल को छोड़कर सभी ग्रह वक्री हो गए हैं। सूर्य और चंद्रमा कभी वक्री नहीं होते। सूर्य के साथ मंगल के भी एक ही राशि में आने से सौरमंडल में अग्नि योग उत्पन्न हुआ है। वैशाखी से निरयण कैलेंडर के अनुसार वर्ष का प्रथम दिन प्रारंभ होगा।
इस देश में निरयण और सायन दो कैलेंडर चलते हैं। सायन कैलेंडर के अनुसार सूर्य का मेष राशि में प्रवेश विगत 20 मार्च को हो चुका है। इसके विपरीत सौर कैलेंडर बताता है कि यह राशि प्रवेश वैशाखी के दिन मेष संक्रांति से होगा। ज्योतिषाचार्य डा. प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार देश में दोनों कैलेंडरों के गणित चल रहे हैं। इन दोनों की तिथियों में 23 दिनों का अंतर है। करीब 800 वर्ष पूर्व दोनों पद्धतियों की संक्रांति एक ही तारीख में होती थी। सूर्य के विचलन के कारण निरयण तारीख आगे बढ़ती है। करीब 84 वर्षों में सूर्य एक अंश बढ़ जाता है। पहले संक्रांति 12 अप्रैल को होती थी, जो निरयण के अनुसार इस बार 13 को होगी और उसका पुण्य काल 14 अप्रैल की सवेरे तक बना रहेगा।
डा. मिश्रपुरी के अनुसार वर्तमान समय में मंगल को छोड़कर बाकी सभी छह ग्रह शनि, बुध, गुरु, शुक्र, राहु और केतु वक्र गति से घूम रहे हैं। यह वक्र गति अग्नि को जन्म देने वाली है। संयोग यह है कि खास वैशाखी के दिन से मंगल और सूर्य एक ही राशि में भ्रमण करने लगे हैं। निश्चय ही यह भ्रमण उग्र तत्वों को जन्म देगा। अग्नि से जुड़ी घटनाएं अधिक होंगी। वैशाखी स्नान सूर्य की मेष संक्रांति में गुरुवार को होने वाला है। इसी दिन देश के विभिन्न भागों में प्रचलित फसलों का वैशाखी त्यौहार भी मनाया जाएगा। मेष संक्रांति का पुण्य काल 14 अप्रैल को प्रात: 08:30 बजे तक बना रहेगा।
स्नान के लिए पहुंचे यात्री
वैशाखी पर्व की पूर्व संध्या पर देश के विभिन्न भागों से लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए पहुंच रहे हैं। वैशाखी स्नान प्रात: चार बजे से प्रारंभ हो जाएगा और सूर्यास्त होने तक चलता रहेगा। आने वाले श्रद्धालुओं में पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और जम्मू कश्मीर के यात्रियों की संख्या सबसे अधिक है। हरकी पैड़ी से सटे क्षेत्रों में स्नान के विशेष प्रबंध किए गए हैं। बुधवार को सायंकालीन आरती में भी भारी भीड़ उमड़ी।