संत जगत में जगद्गुरु शंकराचार्य का पद सबसे बड़ा है। इससे ऊपर कोई उपाधि नहीं। अखाड़ों के भीतर साधु-संतों का अनुशासन चलता है। प्रत्येक अखाड़े में सबसे बड़ा पद आचार्य महामंडलेश्वर का होता है। संतों के 13 अखाड़े हैं और इतने ही आचार्य महामंडलेश्वर। आचार्य बालकृष्ण को आचार्य महामंडलेश्वर पद का प्रस्ताव देने की हर जगह चर्चा हो रही है।
एक वाक्य में कहें तो अखाड़ों के लिए आचार्य ही शंकराचार्य के समान है। अखाड़े के एक-एक संन्यासी को आचार्य ही दीक्षा प्रदान करते हैं। वास्तव में साधु बनने का एक पूरा विधान है। कुंभ मेलों के अवसर पर नए साधुओं को दीक्षित किया जाता है। अखाड़ों के आचार्य महामंडलेश्वर विजयाहोम के बाद व्यक्तियों को महापात्र बनाते हैं। महापात्रों को फिर दीक्षित कर नागा संन्यासी बनाया जाता है। नागाओं के रूप में लंबे तप के बाद उन्हें अखाड़े के साधु का दर्जा मिलता है। योग्यता के अनुसार साधुओं में से कोठारी, कारोबारी, थानापति आदि बनाए जाते हैं। इन पदों पर आने के बाद महंत और कुछ साधना के बाद श्रीमहंतों का दर्जा मिलता है। श्रीमहंत ही अखाड़ों के सभापति और सचिव बनते हैं। श्रीमहंतों से ऊपर का दर्जा है महामंडलेश्वर। इनसे ऊपर है आचार्य महामंडलेश्वर का पद।
आचार्यों का पूरा साम्राज्य अखाड़ों में चलता है। अखाड़ों के मंदिरों, आश्रमों, छावनियों, मठों, देवस्थलों आदि का निर्माण आचार्यों की देखरेख में होता है। इनके लिए करोड़ों का बजट भी आचार्य महामंडलेश्वर ही जुटाते हैं। किसी भी अंतिम निर्णय के लिए वही अधिकृत हैं। यह पद गौरव का पद है। संन्यासियों के सात, बैरागियों के तीन, उदासियों के दो और निर्मलों के एक अखाड़े में यहीं परंपरा है।
सोच समझकर निर्णय लेंगे बालकृष्ण
आचार्य बालकृष्ण पतंजलि योगपीठ के महामंत्री हैं। पतंजलि के दर्जनों उद्योगों के एमडी भी वही हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो 20 हजार करोड का उद्योग बन चुकी पतंजलि आचार्य के दम पर ही चल रही है। पतंजलि उद्योगों के 98.5 शेयरों के मालिक आचार्य बालकृष्ण ही हैं। आचार्य बालकृष्ण के मुताबिक वह सोच समझकर ही कोई निर्णय लेंगे।