अखिल भारतीय संत परिषद के संयोजक स्वामी नृसिंहानंद सरस्वती ने कहा कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का अभिषेक अभिनव तीर्थ ने नहीं कराया था। वास्तव में स्वरूपानंद उनकी वसीयत के आधार पर शंकराचार्य पद पर आरूढ़ हो गए थे। स्वरूपानंद की ओर से अच्युतानंद तीर्थ को लेकर दिए जा रहे बयान सरासर गलत है। उन्होंने कहा कि अखाड़ा परिषद को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम नहीं करना चाहिए।
प्रेस क्लब में बृहस्पतिवार को पत्रकार वार्ता में नृसिंहानंद सरस्वती ने कहा कि शीघ्र ही दिल्ली में हिंदू संसद का आयोजन किया जाएगा। इसमें शंकराचार्य पद सहित अनेक मुद्दों पर निर्णय होगा। स्वरूपानंद सरस्वती वरिष्ठ संत हैं, जिनका सम्मान केवल वरिष्ठता के आधार पर किया जाता है। किसी पद या दायित्व से उनका कोई सम्मान नहीं है। द्वारिका के शंकराचार्य पद पर अच्युतानंद तीर्थ आसीन हैं। वे ही दायित्वों का निर्वहन करेंगे। द्वारिका नहीं जाने पर उन्होंने कहा कि न्यायालय में चल रहे वाद का निस्तारण होने के बाद वे वहां जाएंगे। कहा कि स्वरूपानंद का यह कहना गलत है कि चारों पीठों पर एक ही शंकराचार्य बैठ सकता है, यह धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध है। स्वरूपानंद को अनेक बातों का पता नहीं है।
एक ओर तो स्वरूपानंद कहते हैं अच्युतानंद महाराज उन्हीं के शिष्य हैं और अब उन्हें ही नकली घोषित करना सनातन धर्म तथा आचार्य परंपरा का अपमान है। स्वरूपानंद ने यदि अच्युतानंद का साथ न दिया तो इतिहास उन्हें धृतराष्ट्र के रूप में देखेगा। स्वामी नृसिंहानंद सरस्वती ने कहा कि अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी बेवजह राजनीति कर रहे हैं। अखाड़ा परिषद को शंकराचार्य पदों को तय करने का अधिकार किसी ने भी नहीं दिया। अखाड़ा परिषद को अपनी मर्यादा और अधिकार क्षेत्र में रहकर काम करना चाहिए। अमर्यादित बयानबाजी देश और धर्म के लिए बहुत घातक सिद्ध होगी। शंकराचार्य का अभिनंदन और अभिषेक करना विद्वत परिषद का अधिकार है। ऐसा ही हुआ है।