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बारहसिंगा के प्रवास स्थल के विकास को लग रहे पंख

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ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार
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हरिद्वार वन प्रभाग के अधिकारियों के भगीरथ प्रयासों से एक बार फिर से झिलमिल झील कंजर्वेशन रिजर्व के विलुप्त हो चुके चार प्राकृतिक जल स्रोत पुनर्जीवित हो गए हैं। जल स्रोतों के पुनर्जीवित होने से झील के दलदलीय क्षेत्र का विस्तार हुआ और बारहसिंगों को यह क्षेत्र फिर रास आने लगा है।
झिलमिल झील कंजर्वेशन रिजर्व का कोर एरिया (दलदलीय इलाका) लगभग 148 हेक्टेयर में फैला हुआ है। यह क्षेत्र बारहसिंगा के प्रवास के लिए प्रसिद्ध है। वर्तमान में यहां करीब दो सौ बारहसिंगा हैं। प्राकृतिक जल स्रोतों के कारण यह इलाका बारहसिंगों के प्रवास स्थल के अनुरूप दलदलीय बना रहता था। कुछ सालों से प्राकृतिक स्रोतों से पानी का रिचार्ज कम हो गया था और वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के दौरान गंगा में आई बाढ़ से वेटलैंड क्षेत्र में सिल्ट भर गई और चार स्रोत विलुप्त हो गए थे। इससे 50 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र सूख गया था। ऐसे में बारहसिंगों पर संकट मंडराने लगा था। पिछले साल हरिद्वार वन प्रभाग के अधिकारियों ने चारों जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई। जमा सिल्ट और अनावश्यक झाड़ियों को साफ किया। इसका परिणाम यह रहा कि चार प्राकृतिक जल स्रोतों से फिर पानी आने लगा। इससे सूखा पड़ चुका झील का 50 हेक्टेयर क्षेत्र फिर दलदलीय हो गया। अब यहां फिर से वन्यजीवों के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ी और घास के क्षेत्र का भी फैलाव हुआ। कंजर्वेशन रिजर्व में आने वाले प्रवासी और स्थानीय पक्षियों की प्रजातियों की संख्या पहले के मुकाबले 225 से बढ़कर 268 हो गई। मगरमच्छों की संख्या बढ़कर 17 हो गई है। अब कंजर्वेशन क्षेत्र में कछुआ विकास की योजना पर भी काम किया जा रहा है।
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देश में तीन जगह पाए जाते हैं दलदलीय बारहसिंगा
दलदलीय बारहसिंगा उत्तर प्रदेश की हस्तिनापुर सेंचुरी, असम के काजीरंगा नेशनल पार्क और हरिद्वार के झिलमिल झील कंजर्वेशन रिजर्व में पाए जाते हैं। कई वर्ष पहले तक हरिद्वार से लक्सर तक गंगा का बाढ़ क्षेत्र दलदलीय था और इस पूरे इलाके में बारहसिंगा प्रवास करते थे। बढ़ती आबादी के साथ ही दलदलीय क्षेत्र कम होता गया। झिलमिल झील के वैटलैंड वाले इलाके को बारहसिंगों का गर्भाधान भी बोला जाता हैं, जहां नर और मादा बारहसिंगा समूहों में एकत्रित होते हैं और हस्तिनापुर की तरह बढ़ते हैं। प्रजनन के बाद वहां बच्चों को जन्म देकर झिलमिल झील में लौट आते हैं। लक्सर की तरफ से बारहसिंगों के जाने का रास्ता मानवीय हस्तक्षेप के कारण कई जगह बंद हो गया है। इसलिए इनके गर्भाधान और प्रजनन के लिए झिलमिल का संरक्षण जरूरी है।
बन रहे छोटे-छोटे तालाब
चार प्राकृतिक स्रोत पुनर्जीवित कर वन प्रभाग ने आर्टिशियन वेल बनाए हैं, जिनमें से प्राकृतिक रूप से पानी निकलता है। पानी का फैलाव होने से विभिन्न स्थानों पर छोटे-छोटे कई प्राकृतिक तालाब बन रहे हैं। विभाग ने इन तालाबों को आपस में इटरलिंक किया जा रहा है। इससे पानी पूरे कोर एरिया के चारों तरफ फैल जाएगा।
1976 में जारी किया था डाक टिकट
वन्यजीवों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एक अक्तूबर 1976 को चार वन्यजीवों पर डाक टिकट जारी किए थे। जिसमें कर्दम हिरन (दलदलीय बारहसिंगा) पर 25 पैसे के 50 लाख डाक टिक जारी किए गए थे, जबकि शेर (सिंह) पर 50 पैसे के 30 लाख, तेंदुए पर 1 रुपये के 20 लाख और श्याहगोश पर 2 रुपये के 20 लाख डाक टिकट जारी किए गए थे।
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चार प्राकृतिक जल स्रोतों के पुनर्जीवित होने से दलदलीय क्षेत्र बढ़ा है। छोटे छोटे तालाब बन रहे हैं। झिलमिल झील को संरक्षित करने के लिए कई अन्य योजनाएं भी बनाई जा रही हैं।
- आकाश वर्मा, डीएफओ, हरिद्वार
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