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अष्टम भाव तय करता है मृत्यु का कारण

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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
व्यक्ति का अष्टम स्थान उसकी मृत्यु का कारण बनता है। सभी जन्म कुंडलियों में मृत्यु का कारण जानने के लिए इसी भाव का अध्ययन किया जाता है। अनेक ग्रह रोगों का निर्धारण करते हैं। भारतीय ज्योतिष ज्ञान सचमुच अद्भुत है तथा विश्व के ज्योतिष ज्ञान से कहीं आगे है।
यह निष्कर्ष अमेरिका से आए अनेक ज्योतिष विद्वानों ने कनखल में एक सप्ताह तक चले प्रशिक्षण शिविर के दौरान निकाला। माना गया कि भारतीय ज्योतिष के बारे में जानकारी किए बगैर ज्योतिष को ठीक से नहीं समझा जा सकता। अमेरिकी ज्योतिषियों का दल भारतीय प्राच्य विद्या सोसायटी के अध्यक्ष डा. प्रतीक मिश्रपुरी के नेतृत्व में हरिद्वार आया। शिविर में करीब एक हजार कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया। पाया गया कि आठवां स्थान सभी जन्मपत्रियों में मृत्यु का स्थान है। यह स्थान चंद्रमा से प्रभावित हो तो जल के कारण व्यक्ति की मृत्यु होती है। यदि गुरु का प्रभाव हो तो लीवर अथवा श्वास रोग होते हैं। शनि व्यक्ति की आयु को लंबी बनाता है, किंतु तंत्रिका तंत्र की परेशानी बनाए रखता है। शुक्र से मृत्यु होगी तो यौन रोग मुख्य कारण हो सकते हैं। सूर्य हृदय को प्रभावित करता है। मंगल और शनि की युति हो जाए तो कैंसर जैसे जघन्य रोग आ सकते हैं। निष्कर्ष के अनुसार राहू केतु से हड्डियों और जोड़ों में परेशानी आती है। बुध से मतिभ्रम होता है तथा अवसाद से मृत्यु हो सकती है। डा. मिश्रपुरी ने बताया कि मृत्यु के करीब दो हजार कारण बताए गए हैं। इन सबका अध्ययन ज्योतिष शास्त्र ने किया है।
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भाग लेने वालों में कैर्लिफोनिया की कैथरीन, न्यूयार्क की सकर्वी प्रमुख थी। अन्य सभी प्रतिभागी फ्लोरिडा से आए थे इनमें रैचल, क्रिसटिन, पेरीयट, मोडी, नेल्सन, निकोल, लेरीबेथफिल्ड आदि प्रमुख हैं।
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