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आईआईटी ने 73 छात्रों को निकाला

Thu, 09 Jul 2015 01:12 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/रुड़की
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आईआईटी रुड़की ने प्रथम वर्ष के दो सेमेस्टर में पांच सीजीपीए से कम अंक पाने वाले 73 छात्रों को संस्थान से निकाल दिया गया है। बुधवार को हुई सीनेट की बैठक में मर्सी अपील पर सुनवाई के दौरान पूर्व में लिए गए निर्णय को यथावत रखा गया।
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बैठक से बाहर निकलने पर संस्थान के निदेशक ने कहा कि यह फैसला छात्रों के हित में हैं। उन्हें आगे और मेहनत कर बेहतर भविष्य तैयार करना होगा। संस्थान में बुधवार को सीनेट की बैठक आयोजित की गई। जिसमें प्रशासनिक डीन सहित सभी विभागों के प्रोफेसर मौजूद रहे। बैठक शाम साढ़े तीन बजे शुरू होकर और रात आठ बजे समाप्त हुई।

सबसे आखिर में प्रथम वर्ष के दो सेमेस्टर में औसत पांच सीजीपीए से कम अंक पाने वाले 73 छात्रों की ओर से 22 जून को दी गई मर्सी अपील पर सुनवाई की गई। इससे पहले संस्थान प्रशासन की ओर से इन सभी छात्रों को नोटिस जारी किया गया था।
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बैठक में विभिन्न पहलुओं पर विचार विमर्श करते हुए सभी छात्रों को संस्थान से निकालने का फैसला सुनाया गया। सीनेट की बैठक से बाहर निकलने के बाद संस्थान के निदेशक प्रो. प्रदीप्त बनर्जी ने कहा कि यह पहले से ही तय था। जिसके आधार पर छात्रों को नोटिस दिया गया था।

कहा कि यह छात्रों की भलाई के लिए ही किया गया है, क्योंकि आने वाले सालों में अच्छा नहीं कर पाने पर इनके लिए कोई अवसर नहीं बचता। इसके बाद उन्होंने छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी। डीन एकेडमिक प्रो. प्रमोद कुमार ने कहा कि सीनेट की बैठक में सभी 73 छात्रों को निकाले जाने का फैसला लिया है।


पूर्व के मामलों के मंथन पर भी लिया निर्णय
रुड़की। छात्रों के भविष्य को लेकर सीनेट में हुई मंत्रणा में विगत वर्षों के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए फैसला लिया गया। सूत्रों के अनुसार पिछले कई सालों में शुरू के सेमेस्टर में कम सीजीपीए लाने वाले छात्र बेहतर नहीं कर पाए। जिन्हें बाद में जाकर संस्थान से बाहर निकालना पड़ा। इसके चलते भी इन छात्रों को राहत देने का आधार नहीं बन पाया।


फैसला सुनते ही रो पड़े अभिभावक
सीनेट की बैठक में क्या होने वाला है, इस पर 73 छात्रों सहित उनके अभिभावकों की भी निगाहें टिकी थी। जैसे ही फैसला आया तो छात्रों के चेहरे मुरझा गए और अभिभावकों का गला रुंध आया। फैसले के बाद छात्र कुछ भी बोल पाने की स्थिति में नहीं थे।

फैसले के बाद भी पेशे से चीफ इंजीनियर एक अभिभावक अपने बेटे को एक मौका देने के लिए निदेशक से मिलने के लिए उनके आफिस के बाहर खड़े इंतजार करते रहे। उन्हें उम्मीद थी कि शायद निदेशक उनकी प्रार्थना पर कोई न कोई हल जरूर निकालेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।


एक मौका तो भगवान भी देता है
रुड़की। कुशीनगर निवासी राज महेश्वरी भी उन छात्रों में से एक था। जिन्हें संस्थान से निकाल दिया गया है। फैसला आने के बाद राज की मां अलका पनपानिया बार-बार यही कह रही थी कि एक मौका तो भगवान भी देता है। लेकिन, उनकी भावना सीनेट के फैसले को नहीं बदल पाई। पेशे से बैंक कर्मी पिता दिलीप कुमार पनपानिया ने बताया कि उनकी दोपहर को निदेशक कार्यालय के अधिकारियों से वार्ता हुई थी। जिन्होंने बताया था कि उनके बच्चों को साल रिपीट कराया जा सकता है।


मुख्य एजेंडे में नहीं था छात्रों का भविष्य
रुड़की। सीनेट की बैठक में आमतौर पर ज्यादातर मुद्दे एकडिमक संबंधी होते हैं। 73 छात्रों के भविष्य का फैसला अपने आप में बड़ा था।। लेकिन, इसे मुख्य एजेंडे में शामिल नहीं किया था। यह सप्लीमेंटर एजेंडे में शामिल था। जिसे बैठक के दौरान उपस्थित प्रोफेसर्स को जारी किया गया था और बैठक के आखिर में इस पर विचार विमर्श हुआ।


लाइब्रेरी की साइट पर हिंदी में होंगे पीएचडी सारांश
वैसे तो सीनेट की बैठक में हिंदी को लेकर कोई एजेंडा शामिल नहीं था। लेकिन, लाइब्रेरी संबंधी मुद्दों के दौरान संस्थान निदेशक ने हिंदी के प्रयोग पर जोर दिया। उन्होंने लाइब्रेरी संबंधी साइट पर पीएचडी संबंधी दस्तावेजों में हिंदी में सारांश उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया। संस्थान निदेशक इससे पहले भी पीएचडी के सारांश का हिंदी अनुवाद कर वेबसाइट पर डाले जाने की कवायद शुरू करा चुके हैं।
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