हरिद्वार।
पतित पावनी कलिमल हारिणी मां गंगा का आज जन्मदिवस है। गंगा कहां जन्मी, कहां ठहरी और मानव मात्र कल्याण के लिए इस धरती पर बसी। ब्रह्मलोक में कभी ब्रह्मद्रवी हुई आनंद लोक व्यापिनी गंगा जब धरती पर आई तो न केवल सगर पुत्र तारे, बल्कि जन-जन को बहार दी। सुरलोक से सागर तक की महायात्रा भारत का इतिहास बनी।
भगवती गंगा का जन्म धरती से पहले कभी ब्रह्मलोक में हुए राधा कृष्ण के महारास से हुआ था। राधा कृष्ण एक दूजे में इतने लीन हुए कि जल रूप हो गए। गंगा को तप करते ब्रह्मा ने अपने कमंडल में स्थान दिया और फिर देवों के कल्याण के लिए स्वर्ग में छोड़ दिया। तब से गंगा कभी ब्रह्मलोक तो कभी स्वर्गलोक में बहती रही। इधर धरती पर सगर के 60 हजार पुत्रों की राख कपिल मुनि के आश्रम में पड़ी हुई थी। सगर के उद्दंड पुत्र उस समय मुनि के आश्रम में पहुंचे थे जब उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ के बाद कहीं सगर इंद्रलोक ही न मांग लें, इसलिए इंद्र ने अश्वमेघ का घोड़ा पकड़कर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। सगर के 60 हजार पुत्र जब घोड़ा तलाशते हुए मुनि के आश्रम में पहुंचे तो उन्होंने तपस्या करते मुनि की समाधि भंग कर दी। कुपित मुनि ने तप के ताप से सभी को भस्म कर दिया। तभी गरुड़ ने आकाशवाणी करते हुए कहा कि इनका उद्धार केवल गंगा नदी कर सकती है। तब सगर ने गंगा के लिए तप शुरू किया। उनके पूरे होने के बाद उनके पुत्र असमंजस, पौत्र अंशुमान, प्रपौत्र दिलीप ने अपने जीवन काल में तप किया, लेकिन गंगा नहीं आ पाई। दिलीप के पुत्र राजा भगीरथ दृढ़ इच्छा शक्ति से तपस्या करने हिमालय पहुंचे। उन्होंने ब्रह्मा को प्रसन्न कर धरती के कल्याण के लिए गंगा मांग ली।
ब्रह्मा ने कहा गंगा तो आ जाएगी, पर उनके वेग से धरती पाताल में चली जाएगी। तब भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की। शिव के प्रसन्न होने पर उन्होंने गंगा को जटाओं में समाने का वरदान मांगा। भोले नाथ की स्वीकृति पर गंगा आकर उनकी जटाओं में समा गई। बंधे रहने के लिए गंगा को विचलित देख शिव को लगा कि वे जटाओं से निकलकर धरती को डुबो देंगी। तब शिव ने अपनी जटाओ को बांध लिया और गंगा को वही ठहरना पड़ा। भगीरथ की प्रार्थना पर गंगा को राजी किया कि वह एक धारा के बजाय सात धाराओं में बंटकर बहेंगी। तब गंगा आल्हादिनी, पावनी, नलिनी के रूप में पूर्व दिशा से बही। सुचुश्रु, सीता और सिंघु के रूप में पश्चिम दिशा से बही। सातवीं धारा भगीरथ के पीछे-पीछे चली और गंगा अथवा भागीरथी बन गई। भगीरथ आगे-आगे शंख बजाते-बजाते उन्हें सागर तक ले गए। तब से मां गंगा धरती वासियों को जीवन प्रदान करते हुए धरती पर बह रही हैं।
----------------
गंगा किनारे बसे अनेक तीर्थ
गंगा के किनारे जहां अनेक शहर और गांव बसे, वहीं अनेक तीर्थ भी बसे। इन तीर्थों में उत्तरकाशी, ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयाग, काशी, गंगासागर आदि प्रमुख हैं। गंगा के आने के बाद सभी तीर्थोँ पर गंगाजल के मेले वर्ष भर भरते हैं। चार कुंभों में से दो कुंभ गंगातट पर होते हैं।
-----------------
दूसरे कथानक में हिमालय की पुत्री थी गंगा
एक अन्य कथानक के अनुसार गंगा पर्वत राज हिमालय और मैना की पुत्री थी। गंगा और उमा दो बहने थी, जिनमें गंगा बड़ी थी। गंगा ने जल रूप में धरती पर बहना शुरू किया था, किंतु देवताओं के आग्रह पर धरती से स्वर्ग चली गई थी। गंगा की छोटी बहन उमा बाद में शिव की अर्द्घागिनी बनी। जब गंगा शिव की जटाओं में समाई तब उनके अपनी बहन उमा से मिलने का वर्णन कुछ पुराणों में आता है।