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जहां राधा वहीं कृष्ण वहीं रंग

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ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार। होली पर वसंत का आखिरी पर्व है। इस पर्व पर ऋतु का स्वागत रंगों से किया जाता है। होली भगवान कृष्ण और राधा से जुड़ी हुई है। वास्तव में राधा शाश्वत शक्ति हैं, जो कृष्ण को रस प्रदान करती हैं। महारास के आनंद के बाद जब राधा-कृष्ण रंगोत्सव मनाते हैं, जब वसंत ऋतु में होली का पर्व धरती पर आता है। भारत में ही नहीं किसी न किसी रूप में होली पूरी दुनिया में मनाई जाती है।
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फागुनी मौसम में जब पुरवा चल पड़े तब मधुमास मदनोत्सव लेकर धरती को रंगों को सराबोर कर देता है। शिशिर के बाद वसंत ऋतु के आने पर प्रकृति श्रंगार करती है और यह सृष्टि राधा-कृष्ण के महागीत में खो जाती है। तब अग्नि, परिक्रमा, गीत, संगीत, उमंग और कामनाओं की होली शुरु होती है। वास्तव में जहां राधा हैं, वहीं कृष्ण हैं और वहीं होली के रंग हैं। होली का यह पर्व उड़ते रंग-गुलाल के साथ-साथ अग्नि का भी पर्व है। इस ऋतु में इन्हीं दिनों विश्व के अनेक भागों में होली पर्व किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। संयोग से चीन और ताइवान में जनवरी के अंत से अग्नि पर्वों की शुरुआत होती हैं तथा रंगों से समापन हमारी होली के साथ ही होता है। भारतवासी गुलामी के काल में हिन्दुस्तान से जिन-जिन देशों में गए, उन सभी में होली मनाई जाती है। मार्च के महीनें में थाईलैंड सौंगक्रान पर्व मनाता है, जिसमें इत्र मिश्रित जल का प्रयोग एक-दूसरे पर सुगंध पर्व मनाया जाता है। हंगरी में इन्हीं दिनों होली जैसा पर्व मनता है। बेल्जियम में मार्च के महीने में फूल-डे अर्थात मूर्ख दिवस मनाया जाता है। लकड़ी जलाकर अग्नि परिक्रमा करने का रेडिका पर्व मार्च में ही इटली में मनाया जाता है। हॉलैंड आदि अनेक यूरोपीय देशों में विश्व प्रसिद्ध नृत्य और गायन का पर्व कार्नीवाल इन दिनों चल रहा है। जिस प्रकार हमारे यहां एक-दूसरे पर रंग फेंकते हैं, उसी प्रकार यूरोप के तमाम देशों में एक-दूसरे पर टमाटर फेंकने के परम्परा है। नीदरलैंड कईं टन टमाटरों का रस नगर की सैकड़ों पर बहाकर उसमें तैरते हुए मधु पर्व मनाया जाता है।
होली का पर्व भारत के चार बड़े पर्वों मेें से एक है। वास्तव में देखा जाए तो चार में भी होली और दीवाली पूरे भारत को एक जुट कर देती हैं। इन पर्वों पर समूचे भारत में एक जैसा दृश्य उत्पन्न होता है। इनका शुभारंभ होली से कुछ दिन पहले हो जाता है। होली पर्व फूलों से ही जुड़ा है। चूंकि होली के इस अवसर पर पतझड़ के बाद नई कोपलें निकलती है और नये फूल खिलते हैं, अत: कुदरत का प्रकृतिक श्रृंगार हो जाता है। भारतीय संस्कृति में अग्नि पूजा मकर संक्रांति से शुरू होती है। इस पूजा का समापन जलती होली के परिक्रमा के बाद आज होगा। होली का पर्व सब के लिए उल्लास लेकर आता है।
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