अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
पूरा समाज शांति की खोज में है। दुख एक प्रमुख समस्या बन गई है। इसका कारण है भाव संवेदना की कमी, बेचैनी, अशांत मन और एकाग्रता की कमी। ध्यान से अपने मन की विशेषताओं को जगाया जा सकता है और महामानव बना जा सकता है।
यह बात देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रणव पंड्या ने मृत्युंजय सभागार में ध्यान की विशेष कक्षा में कही। उन्होंने गीता के द्वितीय अध्याय के श्लोक 66 का उदाहरण देते हुए कहा कि योगरहित पुरुष की निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त पुरुष में आत्म विषयक भावना नहीं होती। भावनाहीन मनुष्य को शांति नहीं मिलती है और अशांत मनुष्य को सुख कहां मिल सकता है।
उन्होंने कहा कि सुख की प्राप्ति के लिए मनुष्य के अंदर भाव संवेदना का होना जरूरी है। भाव संवेदना ही मनुष्य के अंदर मनुष्यत्व का विकास करती है। मनुष्यत्व से देवत्व की ओर बढ़ने में प्रेरित करती है।
डा. पंड्या ने कहा कि नियमित ध्यान करने से मन की विशेषताओं को उनकी शक्तियों को जगाया जा सकता है। ध्यान से जीवन में शांति आती है, एकाग्रता का भाव जागृत होता है तथा अंतर्जगत का परिमार्जन होता है। उन्होंने मन को शांत करने की विभिन्न विधियों पर भी प्रकाश डाला।
डा. प्रणव पंड्या ने विद्यार्थियों की शंकाओं का समाधान भी किया। इससे पहले संगीत विभाग की ओर से ध्यान पर विशेष गीत प्रस्तुत किए। इस अवसर पर कुलपति शरद पारधी, प्रतिकुलपति डा. चिन्मय पंड्या, कुलसचिव संदीप कुमार सहित दंवसंस्कृति विश्वविद्यालय के आचार्य और विद्यार्थी उपस्थित थे।