कौशल सिखौला
हरिद्वार।
बापू ने हरिद्वार के गंगा तट पर पांच वस्तुएं छोड़ने का संकल्प लिया था। वे दक्षिण अफ्रीका से सीधे गंगा तट पहुंचे थे और अपने जीवन की पांच बुराइयों का त्याग किया था। बापू तीन बार हरिद्वार और नौ बार उत्तराखंड आए। उन्होंने वर्ष 1915 के कुंभ में कस्तूरबा के साथ हरकी पैडी पर गंगा स्नान भी किया था।
वास्तव में कांग्रेसी चिंतक सीएफ एंड्रयूज ने दक्षिण अफ्रीका में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे बापू से संपर्क साधा था। उन्होंने भारत की दयनीय स्थिति बखान करते हुए उनसे आग्रह किया था कि वे भारत आकर आजादी का आंदोलन चलाएं। बापू के लौटने पर एंड्रयूज ने उन्हें सलाह दी कि वे भारत में रवींद्र नाथ टैगोर, पं. मदन मोहन मालवीय एवं हरिद्वार में गंगा तट पर साधन में जुटे स्वामी श्रद्धानंद से जरूर मिलें। संयोग से उस वर्ष 1915 में हरिद्वार का कुंभ मेला चल रहा था। बापू ने हरिद्वार की यात्रा की। वे बैलगाड़ी से सफर करते हुए नीलधारा के गंगा तट पहुंचे और वहां से नाव से गंगा पार कांगड़ी में स्वामी श्रद्धानंद के गुरुकुल गए। श्रद्धानंद ने उन्हें भारत की स्थिति का मौन दर्शन और चिंतन कराया। बापू ने अपने साथ आई कस्तूरबा के साथ बाद में हरकी पैडी जाकर कुंभ स्नान किया। वे धर्म में बहुत आस्था तो नहीं रखते थे, किंतु उन्होंने यहां उपस्थित श्रद्धालुओं के सम्मुख कहा कि वे गंगा के इस तट पर पांच वस्तुएं छोड़ रहे हैं। इनमें पानी शामिल नहीं है। बापू ने यह खुलासा तो कभी नहीं किया कि उन्होंने क्या-क्या छोड़ा, लेकिन अपनी आत्मकथा में भी उन्होंने जुआ और शराब के साथ पांच बुराइयां गंगा तट पर छोड़ने की बात स्वीकार की।
बापू 1917 और 1920 में भी हरिद्वार आए। उन्होंने बाद में उत्तराखंड की कुल नौ यात्राएं की तथा तीन बाद ऋषिकेश, देहरादून और मसूरी जाते हुए कुछ समय के लिए हरिद्वार में रुके। बापू कौसानी, रानीखेत और अल्मोड़ा भी गए। पहाड़ों धार्मिक संस्कृति ने उन्हें आकर्षित किया। बापू ने खुद लिखा है कि हरिद्वार कुंभ में आए लाखों लोग गलत नहीं हो सकते हैं। उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी में दिए व्याख्यान का जिक्र भी अपनी आत्मकथा में किया। बापू ने लिखा है कि गंगा तट पर ज्ञान साधना के माध्यम से देश भक्तों की फौज खड़ी करने वाले स्वामी श्रद्धानंद अद्भुत व्यक्ति थे। उन्होंने कनखल की चर्चा भी अपनी पुस्तक में की है। बापू जब तीसरी बार हरिद्वार आए तब स्वामी श्रद्धानंद ने ही उन्हें महात्मा की उपाधि दी थी। यद्यपि कुछ क्षेत्रों में यह भी माना जाता है कि उन्हें यह उपधि विश्व कवि रवींद्र नाथ टैगोर ने दी थी। बापू का जीवन वास्तव में देश बन गया, किंतु हरिद्वार के गंगा तट और श्रद्धानंद ने उन्हें जो दिया उसे वे कभी नहीं भुला पाए।