अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
जेल प्रशासन ने हरिद्वार जेल में चल रहे वीआईपी कंपनी के तीन मिनी प्लांट बंद कर तीस लाख रुपये सालाना के राजस्व पर ठोकर मार दी। हालांकि बाद में शासन के संज्ञान लेने पर जेल के अधिकारी बैकफुट पर आए और अब वे वीआईपी कंपनी के अधिकारियों की मान मनौव्वल में जुटे हैं।
वर्ष 2010 में जेल कैंपस में वीआईपी का मिनी प्लांट वजूद में आया था। जेल में प्लांट स्थापित करने के पीछे तब जेल के अधिकारियों का मकसद ये था कि कैदी स्वावलंबी होंगे। जब वे छूटकर जेल से बाहर निकलेंगे तब वे हुनरमंद हो चुके होंगे। ऐसे में अपनी एक दुनिया की शुरुआत करने में उनके समक्ष दिक्कत नहीं आएंगी। यही नहीं सरकार का खजाना भी इन प्लांटों के संचालित होने पर भरेगा। देखते ही देखते कुछ समय में जेल में वीआईपी कंपनी प्रबंधन ने तीन प्लांट चालू कर दिए थे। जेल के प्लांटों में अल्फा, स्काई बैग, प्रीमियम लगेज जैसे प्रोडक्ट बन रहे थे। इन प्लांटों की बदौलत सरकार को करीब तीस लाख रुपये सालाना मिल रहा था। पिछले कुछ समय से जेल के अफसर वीआईपी प्रबंधन पर मेहनताने में इजाफा करने को लेकर दबाव बना रहे थे। वीआईपी प्रबंधन के इंकार करने पर जेल प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए प्लांट बंद करा दिए। गुजरे मंगलवार से जेल में वीआईपी के प्लांट बंद हो चुके थे और प्रबंधन ने अपना सामान भी समेट लिया था। रविवारर देर रात से जेल का पूरा सिस्टम ही मानो हिल गया। आनन- फानन में वीआईपी प्रबंधन से फिर से उसी मेहनताने पर अपना प्लांट चालू करने का आग्रह किया गया। चर्चा ये है कि देहरादून गृह विभाग में बैठे एक अफसर ने इस पर संज्ञान लिया और जेल के अधिकारियों को सलाना तीस लाख के राजस्व के चपत को लेकर फटकार लगाई।
आईजी जेल ने मेहनताना बढ़ाने के लिए कहा था। जिस पर वीआईपी प्रबंधन ने इंकार कर दिया था। अब फिर से प्लांट खोलने के लिए वीआईपी कंपनी प्रबंधन से संपर्क साधा गया है।
- एसएम सिंह, जेलर हरिद्वार जेल