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कई साल बाद राजहंसों से गुलजार हुए गंगा के तट

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ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार
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कई साल बाद गंगा के तट राजहंसों से गुलजार हुए हैं। पिछले सालों की अपेक्षा हरिद्वार में गंगा घाटों पर पहुंचने वाले राजहंसों के जोड़ों में करीब चार गुना की वृद्धि हुई है। गंगा तटों पर राजहंसों की इतनी बड़ी संख्या पहले नहीं देखी गयी है। गुरुकुल कांगड़ी विवि के जंतु और पर्यावरण विज्ञान विभाग में किए गए शोध कार्य में इसका का दावा किया गया है।
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कईं साल तक राजहंसों की 6 से 10 जोड़ी ही शीत प्रवास के लिए हरिद्वार के गंगा के तटों पर आती रही हैं। मगर इस शिशिर ऋतु में राजहंसों की 36 जोड़ी गंगा के तटों पर पहुंच चुकी हैं। इतनी बड़ी संख्या में राजहंसों का जोड़ा हरिद्वार के गंगा तटों पर पहले कभी नहीं पहुंची है। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय पक्षी वैज्ञानिक प्रोफेसर दिनेश भट्ट के निर्देश में किए गए शोध कार्य में यह तथ्य पेश किए गए हैं। प्रो. भट्ट की प्रयोगशाला में कार्य करने वाले युवा वैज्ञानिक कईं वर्षों से हरिद्वार के गंगा घाटों पर राजहंसों के आवागमन पर नजर बनाए हुए थे। प्रो. दिनेश भट्ट का दावा है कि गंगा तटों पर राजहंसों के अनुकूल पर्यावारण, हिमालय में बार-बार बर्फ का गिरना, मिस्सरपुर गंगा तट पर और आस पास के क्षेत्रों में अवैध खनन में कमी आने से मानवीय दखल का कम होना आदि कारणों से गंगा के तटों पर राजहंसों की बढ़ोत्तरी में अनाचक वृद्धि हुई है। चूंकि राजहंस शाकाहारी प्राणी है और वह जलीय तटों पर रहना पसंद करता है। ऐसे में यहां जलीय वनस्पतियां प्रचुर मात्रा में इन्हें उपलब्ध हो जाती है। प्रो दिनेश भट्ट ने बताया कि पिछले वर्षों में जो हंस के जोड़े यहां आते रहे वो वापस जाने पर यह एहसास करके जाते हैं कि कौन सा जलीय क्षेत्र उनके शीत प्रवास के लिए अनुकूल हैं। इन्हीं जोड़ों द्वारा अन्य राजहंसों के जोड़ों को संकेत दिए जाता है कि हम बताएंगे कि कौन सा क्षेत्र शीत प्रवास व भोजन के लिए अनुकूल है। बताया कि राजहंस कैलाश मानसरोवर के क्षेत्र से हिमालय के उतंग शिखरों को पार कर भारत भूमि पर शिशिर ऋतु में आते हैं। बसंत ऋतु के अंतिम चरण में वापस चले जाते हैं।
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