उत्तराखंड क्रांति दल का पंवार गुट राज्य में वर्ष 2016-17 के विधानसभा चुनाव में सभी 70 सीटों पर प्रत्याशी उतारेगा। केंद्रीय अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह पंवार ने सोमवार को एक होटल में पत्रकार वार्ता के दौरान 26 विधानसभा क्षेत्रों के लिए प्रत्याशियों की सूची जारी की।
रायपुर से एनके गुसाईं, मसूरी से अनिरुद्ध शर्मा, धर्मपुर से गीता बिष्ट, डोईवाला से सुरेंद्र दत्त पेटवाल, यमुनोत्री से उपेंद्र गौड़, गंगोत्री से बिष्णुपाल रावत, बदरीनाथ से बच्चीराम उनियाल, रुद्रप्रयाग से बृजकिशोर थपलिया, देवप्रयाग से गणेश भट्ट, नरेंद्रनगर से किशन सिंह रावत, टिहरी से रेखा मियां, धनोल्टी से सिया सिंह चौहान,प्रत्याशी है।
इसके अलावा हरिद्वार ग्रामीण से बल सिंह सैनी, भगवानपुर से सतपाल सिंह चमार, रुड़की से आदेश शर्मा, यमकेश्वर से प्रदीप राणा, श्रीनगर से आशुतोषपुरी महाराज, चौबट्टाखाल से जय ममगाईं, लालकुआं से विमला नेगी, नैनीताल से जगमोहन वाल्मीकि, हल्द्वानी से राकेश चौहान, बाजपुर से विजयपाल चौधरी, रुद्रपुर से इरफान अल्वी को प्रत्याशी घोषित किया है।
भाजपा कांग्रेस नहीं उक्रांद की खुद से है टक्कर
भाजपा और कांग्रेस
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राज्य गठन आंदोलन में अग्रणी रहे उत्तराखंड क्रांति दल आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा कांग्रेस से अधिक अपने गुटों के बीच भिड़ता दिखेगा। गुटबाजी से उक्रांद में डेढ़ फीसद मतदाता शेयर नहीं रह गया है, लेकिन वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में उक्रांद के पुष्पेश त्रिपाठी और त्रिवेंद्र सिंह पंवार गुट अलग अलग चुनाव में उतरेंगे।
पंवार ने सोमवार को 26 प्रत्याशियों की सूची घोषित कर गुटबाजी के विवाद को और हवा दे रही है, जिससे साफ हो गया है प्रदेश में तीसरा सियासी कोण बनाकर भाजपा कांग्रेस की दिक्कतें बढ़ाने के बजाए एक दूसरे को मात देने का है।
शीर्ष नेतृत्व के बीच आपसी मतभेदों से दल खो रहा अपना जनाधार
राज्य गठन में अहम भूमिका निभाने वाले उत्तराखंड क्रांति दल के शीर्ष नेतृत्व के बीच आपसी मतभेदों से दल अपना जनाधार खो रहा है। दो दशकों से काशी सिंह ऐरी, त्रिवेंद्र सिंह पंवार और दिवाकर भट्ट के इर्दगिर्द दल घूमता रहा। इन नेताओं ने अलग अलग खेमे बनाए तो दल कई टुकड़ों में बंट गया।
राज्य में अब तक हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर गौर किया जाए तो उक्रांद का ग्राफ लगातार गिरा है। वर्ष 2002 में दल का मत प्र्रतिशत लगभग 7.2 रहा, जबकि चार विधायक जीत कर सदन में आए।
वर्ष 2007 में यह साढ़े पांच प्रतिशत पहुंचा और तीन विधायक जीतकर आए। वर्ष 2012 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दल के दो गुटों ने अलग अलग चुनाव लड़ा।
फील्डमार्शल ने थाम लिया भाजपा का दामन
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फील्डमार्शल कहे जाने वाले दिवाकर भट्ट सहित एक अन्य विधायक गोपाल रावत ने भाजपा का दामन थाम लिया, जबकि उक्रांद की टिकट पर चुनाव लड़े प्रत्याशियों के हिस्से 1.2 प्रतिशत मत आए और प्रीतम सिंह पंवार एकमात्र विधायक सदन में पहुंचे।
लिहाजा उक्रांद के खाते में सिर्फ एक सीट आई और मत फीसदी इतना गिरा कि निर्वाचन आयोग से क्षेत्रीय दल की मान्यता भी गंवानी पड़ी।
अब वर्ष 2017 के विधानचुनाव से ठीक पहले दो खेमे आमने सामने हो गए हैं। भले निर्वाचन आयोग ने पुष्पेश त्रिपाठी की अध्यक्षता वाले धड़े को मान्य और पार्टी सिंबल आवंटित किया है, लेकिन कई वर्षों से पार्टी के अध्यक्ष रहे त्रिवेंद्र पंवार के अलग से प्रत्याशी घोषित करने से सारे समीकरण बिगड़ जाएंगे।
पुष्पेष त्रिपाठी ने पंवार के उक्रांद से घोषित प्रत्याशियों को असंवैधानिक करार दिया। उधर, त्रिवेंद्र सिंह पंवार का कहना है कि उक्रांद के असली अध्यक्ष वहीं हैं और मामला चुनाव आयोग में विचाराधीन है।