तीर्थयात्रियों और सैलानियों से गुलजार रहने वाली गंगोत्री घाटी अब वीरान हो गई है। जो होटल-धर्मशालाएं यात्रियों से खचाखच भरे रहती थे, उन पर ताले लटके हैं। घाटी में सन्नाटा पसरा हुआ है।
चारधाम यात्रा पर निर्भर थी रोजी
गंगा घाटी के ज्यादातर गांवों के लोगों की रोजी चारधाम यात्रा पर निर्भर थी। यहां हजारों लोग यात्रा के दौरान स्वरोजगार करते थे।
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पिछले कुछ वर्षों में यहां कई बड़े होटल और दुकानें खुली, जिससे सिर्फ छह माह के यात्रा काल में वे अच्छी-खासी आय अर्जित कर लेते थे, लेकिन 16-17 जून की बाढ़ ने इन लोगों की रोजी-रोटी पर पानी फेर दिया है।
सता रही चिंता
बाढ़ से उत्तरकाशी से गंगोत्री तक सड़क जगह-जगह क्षतिग्रस्त है। इसे खोलने में अभी लंबा समय लगने के आसार हैं। ऐसे में यात्रा पर निर्भर हजारों लोगों को अपने परिवार के पालन-पोषण की चिंता सता रही है। लोग अपने होटल, दुकान तथा ढाबों से सामान समेट कर घर लौट गए हैं।
इसी वर्ष बैंक से 20 लाख का ऋण लेकर नेताला में होटल बनाया। एक होटल किराया पर चलाता था। मैं तो बेरोजगार हुआ ही साथ में होटल में काम करने वाले 20 युवाओं के समक्ष भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो रखा है।
- आमोद पंवार, होटल व्यवसायी
दस वर्षों से यात्राकाल के दौरान गंगोत्री में होटल चलाता हूं। सीजन में इतना कमा लेता था कि साल भर की आजीविका आसानी से चल जाती थी। इस बार तो होटल चलाने के लिए खरीदे गए राशन की कीमत भी नहीं उठ पाई। अब तो राशन वालों के उधार चुकाने की चिंता भी है।
-फत्ते सिंह, होटल व्यवसायी