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हेल्प कम भ्रमित ज्यादा कर रहे कंट्रोल रूम

Fri, 21 Jun 2013 04:53 PM IST
देहरादून/राजेश शर्मा
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मेरठ के माधवपुरम निवासी सुभाष चौधरी अपने भाई ललित और कई अन्य साथियों के साथ चार दिन से कभी देहरादून तो कभी ऋषिकेश और जौलीग्रांट के चक्कर काट रहे हैं।
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उन्हें तलाश है केदारनाथ मंदिर में दर्शनों को गए अपने पिता संदीप चौधरी और उनके छह साथियों की। जो देवभूमि में आई विभीषिका में कहीं फसें हुए हैं लेकिन पीड़ितों और उनके परिजनों की मदद का दावा करने वाले तंत्र के किसी भी कंट्रोल रूम से उन्हें अभी तक कोई मदद नहीं मिल पाई।

सहायता करने के बजाए कंट्रोल रूम से दी जा रही जानकारी उन्हें भ्रमित ज्यादा कर रही है।

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उत्तराखंड पुलिस की ओर से देहरादून स्थित राज्य पुलिस मुख्यालय में पीड़ितों के संबंध में जानकारी देने के लिए बनाए गए कंट्रोल रूम बनाया गया है। यहां हताश और परेशान बैठे सुभाष ने बताया कि उसके पिता अपने छह अन्य साथियों के साथ दस जून को केदारनाथ मंदिर में दर्शनों को गए थे। उनकी अंतिम बार उनसे 15 जून को फोन पर बात हुई।
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आपदा ने सब कुछ बदल दिया
तब वे गौरीकुंड में थे। उन्होंने बताया था कि सब कुछ ठीक है वे अगले दिन वापसी के लिए रवाना होंगे लेकिन उसी रात को आयी आपदा ने सब कुछ बदल दिया। संदीप और उनके सभी साथी तभी से गुम हैं। किसी का भी मोबाइल फोन नहीं मिल रहा है।

अपने स्तर पर सभी संभव कोशिश कर चुके वे लोग इस उम्मीद में सरकारी तंत्र की हेल्पलाइन में आए थे कि वहां से कुछ मदद मिलेगी। दो दिन पहले पुलिस मुख्यालय से उन्हें बताया गया कि उनके लोगों को बचाकर जौलीग्रांट लाया गया है। वे तुरंत दौड़ पड़े लेकिन वहां जो लोग पहुंचे उनमें उनके अपने नहीं थे। उम्मीद के साथ वे ऋषिकेश स्थित जयराम आश्रम, डिग्री कॉलेज और राज्य अतिथि गृह में बनाए गए राहत शिविरों में भी गए लेकिन कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है।

मददगार साबित नहीं हो रहे केंद्र
सुभाष ने मायूसी के साथ कहा कि सहायता के नाम पर बना दिए गए केंद्र लोगों को राहत पहुंचाने में मददगार साबित नहीं हो रहे हैं। यही हाल बस्ती से आए राजकिशोर और दिल्ली के मदन मोहन का भी है। उनके अपने भी आपदा में कहीं गुम हैं लेकिन कहीं से कोई खबर नहीं आ रही है। केवल नाम और नंबर लिखकर फिर बताएंगे कहकर उन्हें सांत्वना देने की कोशिश भर की जा रही है।

ये सूची किस काम की
राज्य पुलिस के कंट्रोल रूम में पिछले तीन दिनों में केदारनाथ, जोशीमठ और अन्य आपदा प्रभावित क्षेत्रों से करीब दो हजार ऐसे लोगों की सूची भेजी गई है जिन्हें आपदा से बचाकर लाने का दावा किया जा रहा है। लेकिन उनमें से अधिकतर लोगों के बारे में आधी अधूरी जानकारियां दी गई हैं। मसलन नाम के कॉलम में खाली रेणु या पवन लिख दिया गया है। उनके पिता पति और शहर का नाम नहीं दिया गया।

परिणामस्वरूप इन नामों के जो लोग लापता हैं उनके परिजन उन्हें अपना समझकर तलाशने में जुट गए। समस्या और भी ज्यादा तब बढ़ रही है जब बचाकर ले जाने की बात कहीं जा रही है वे वहां मिल ही नहीं रहे हैं। कंट्रोल रूम में तैनात कर्मचारी और अधिकारी इन लोगों की परेशानी को समझ तो रहे हैं लेकिन कोई मदद करने के बजाय उन्हें गोलमोल जवाब देकर टाल रहे हैं। जिला मुख्यालयों से तालमेल का अभाव साफ नजर आ रहा है।

लोकेशन बता दो, खुद जाकर ले आएंगे
दिल्ली के जागृति एंकलेव निवासी सर्राफा व्यवसायी चंद्रकिशोर जौहरी और उनके रिश्तेदार पुलिस अधिकारियों से बार- बार गुजारिश करते रहे कि किसी भी तरीके से उनके लापता भाई पवन जौहरी, भाभी मंजू और चार अन्य परिजनों की लोकेशन पता करके बता दें। वे खुद अपने संसाधन जुटाकर किसी भी सूरत में उन्हें ले आएंगे लेकिन उन्हें दो दिन में ऐसी भी कोई जानकारी नहीं मिल पायी।

जौहरी परिवार के ये छह सदस्य छह जून को चार धाम यात्रा पर गए थे। अंतिम बार उनकी 16 जून को बात हुई, लेकिन इसके बाद से वे कहां हैं इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। पुलिस मुख्यालय में लगी बचाए गए लोगों की सूची में पवन और उनकी पत्नी लिखा है। इन्हें केदारनाथ से बचाकर गुप्तकाशी ले जाए जाने की बात कही गयी है लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी उन्हें सही लोकेशन नहीं मिल पाई। अंतिम जवाब मिला कि प्रयास जारी हैं।
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हर कंफ्यूजन दूर करेंगे
कंट्रोल रूम के प्रभारी सीओ पीके राय का कहना है कि आधी अधूरी सूची बनाने से कुछ दिक्कतें तो आ रही हैं लेकिन संबंधित जिलों से संपर्क कर सभी का कंफ्यूजन दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। उत्तराखंड पुलिस हर पीड़ित की हर संभव मदद कर रही है।
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