अप्रैल की भीषण गर्मी में ये नौनिहाल उत्तराखंड के चंपावत में शारदा नदी के किनारे पढ़ रहे हैं।
भविष्य का सपना संजोने की तमन्ना रखने वाले उत्तर प्रदेश के इन बच्चों के माता-पिता यहां शारदा नदी में चुगान करते हैं। इस अस्थाई पाठशाला में मौजूदा शिक्षा सत्र में 30 अप्रैल तक पढ़ाई होगी। इस स्कूल में न बैठने के लिए कमरा है न फर्नीचर। बस एक ब्लैकबोर्ड और नदी किनारे रोखड़ में टाट-पट्टी पर बैठकर ये बच्चे ज्ञान हासिल करते हैं।
बदायूं, शहाजहांपुर, सीतापुर, पीलीभीत, बरेली, हरदोई, लखीमपुर खीरी जिलों से काम की तलाश में सैकड़ों माता-पिताओं के साथ ये बच्चे भी यहां आए हैं। अक्तूबर से बरसात शुरू होने से पूर्व तक खनन का काम होता है। माता-पिता खनन कारोबार से परिवार की गाड़ी चला रहे हैं, तो इन बच्चों को टनकपुर में शारदा नदी के किनारे अस्थाई रूप से बनाए गए स्कूल में शिक्षा दी जा रही है।
सर्वशिक्षा अभियान के जिला समन्वयक एके चौबे बताते हैं कि एसएसए के गैर आवासीय विशिष्ट प्रशिक्षण (एनआरएसटी) कार्यक्रम के तहत इन बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। इन बच्चों को गैडाखाली, नायकगोठ और कालाझाला के प्राथमिक स्कूलों से संबद्ध किया गया है।
छह से 14 वर्ष आयु वर्ग के इन बच्चों को कक्षावार नहीं, सामूहिक रूप से पढ़ाई कराई जाती है। यहां पढ़ने वालों को विभाग द्वारा प्रमाणपत्र दिया जाता है। जिससे इन छात्र-छात्राओं का अगली कक्षा में दूसरे स्कूलों में प्रवेश हो सके।
एनआरएसटी कार्यक्रम के तहत 2015-16 के लिए जिले में 246 बच्चों का लक्ष्य रखा गया था। मगर शारदा नदी किनारे संचालित स्कूल में 195 ही बच्चे आए। प्रत्येक छात्र के लिए एक सत्र में किताब, यूनीफार्म, मध्यान्ह भोजन योजना आदि की व्यवस्थाओं के लिए 2675 रुपये का खर्च आता है। 30 अप्रैल तक ये शिक्षा सत्र चलेगा।
- जिला समन्वयक, सर्वशिक्षा अभियान, चंपावत
पढ़ाई की निरंतरता बनाता है एनआरएसटी
एनआरएसटी कार्यक्रम का मकसद स्कूली शिक्षा से किसी भी रूप से वंचित छात्र-छात्राओं को शिक्षण व्यवस्था मुहैय्या कराना है।
शारदा नदी के रोखड़ में पढ़ रहे इन बच्चों का दाखिला उप्र के अलग-अलग जिलों में है, लेकिन माता-पिता के साथ दूसरी जगह जाने से उनकी पढ़ाई छूटी। ऐसे में उनकी पढ़ाई की निरंतरता को बनाए रखने के लिए योजना का सहारा लिया गया है। चंपावत में एनआरएसटी कार्यक्रम दो साल पहले शुरू हुआ।