राज्य की राजनीतिक परिस्थितियां बेहद नाजुक मोड़ पर पहुंच गई हैं। इस सियासी संकट से बचने के लिए हरीश रावत के सामने अब
सीमित विकल्प ही बचे हैं। हालांकि जितने भी विकल्प सरकार को बचाने के हैं, उनमें से कोई भी रास्ता बहुत आसान नहीं लगता है।
विकल्प एक : हरीश रावत के सामने पहला विकल्प है कि जो भाजपा ने किया है वहीं रास्ता वह भी अख्तियार कर लें और भाजपा के
विधायकों को अपने साथ ले आए। यह काम बेहद मुश्किल है, क्योंकि सभी विधायक प्रदेश से बाहर गुड़गांव में हरियाणा सरकार की
निगरानी में है। यदि हरीश ऐसा करते भी है तो जितनी सहानुभूति उनके प्रति उमड़ी है, उसके कम होने की संभावना रहेगी।
विकल्प दो : दूसरा रास्ता अपने बागी नौ विधायकों को मनाकर वापस लाने का है। यह काम भी फिलहाल नामुमकिन लगता है।
क्योंकि सभी बागी विधायक भाजपा नेतृत्व की निगरानी में हैं। वैसे भी विजय बहुगुणा, हरक सिंह रावत और सुबोध उनियाल के रास्ते
बंद करने के बाद कांग्रेस के लिए यह काम और भी जटिल हो गया है। सभी विधायक बहुगुणा व हरक के कहने पर ही बागी हुए हैं।
विकल्प तीन : यह रास्ता थोड़ा रिस्की तो है, लेकिन सर्वाधिक राहत इसी से मिल सकती है। जिन नौ विधायकों के घरों पर नोटिस
चस्पा किए हैं, उनकी विधानसभा की सदस्यता रद्द कर दी जाए। सदस्यता रद्द करने के आदेश के बाद फिर न्यायालय ही एक मात्र
रास्ता है।
जब तक गलत और सही का निर्णय होगा तब तक सरकार चलती रहेगी और फिर चुनाव। हालांकि 35 विधायकों ने स्पीकर
के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है और इन 35 में नौ कांग्रेस के बागी हैं। विधानसभा संचालन नियमावली के तहत
जब कोई सदस्य स्पीकर के खिलाफ अविश्वास जता दें तो स्पीकर को अगले 14 दिन तक उसके खिलाफ सुनवाई का अधिकार नहीं
रहता।