चंपावत वन विभाग सभागार में बैठक करते प्रमुख वन संरक्षक (एचओएफएफ)। संवाद
चंपावत। चंपावत वन प्रभाग में इको-टूरिज्म के क्षेत्र में व्यापक संभावनाएं हैं। धार्मिक, साहसिक और प्रकृति आधारित पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में विभाग कार्य कर रहा है। मायावती क्षेत्र में बर्ड वॉचिंग की प्रचुर संभावनाएं चिह्नित की गई हैं। भविष्य में जिले में बर्ड फेस्टिवल का आयोजन कर नई संभावनाओं को तलाशा जाएगा। इससे स्थानीय होम स्टे और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। यह बातें प्रमुख वन संरक्षक (एचओएफएफ) डॉ. धनंजय मोहन ने चंपावत में प्रेसवार्ता के दौरान कहीं।
रविवार को वन विभाग सभागार में आयोजित प्रेस वार्ता में प्रमुख वन संरक्षक (एचओएफएफ) ने कहा कि पंचेश्वर क्षेत्र में एंग्लिंग पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए छोटे-छोटे नदी-नालों का संरक्षण कर महाशीर मछली के लिए सुरक्षित और अनुकूल ब्रीडिंग वातावरण विकसित करने की योजना बनाई जाएगी। बताया कि ग्रॉस इनवायरंमेंट प्रोडेक्ट के कांसेप्ट को अपनाकर आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता दी है। प्रमुख वन संरक्षक ने स्थानीय नागरिकों और ग्रामीणों से वनाग्नि की घटनाओं को रोकने में विभाग का सहयोग करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि इस फायर सीजन में प्रदेश में कोई भी बड़ी वनाग्नि की घटना सामने नहीं आई है। बताया कि उत्तराखंड फॉरेस्ट फायर एप विकसित किया गया है। एप आधारित सूचना और अलर्ट प्रणाली संचालन से वनाग्नि की रोकथाम काफी मददगार हो रही है। उन्होंने बताया कि देहरादून में स्थापित इंटिग्रेटेड कंट्रोल रूम के माध्यम से प्रदेश भर की निगरानी की जाती है। यह एप आम नागरिकों के लिए भी उपलब्ध है। बताया कि वन विभाग ने मौसम विभाग के साथ एक समझौता किया है। इसके तहत विभाग को कस्टमाइज्ड वेदर रिपोर्ट्स प्राप्त हो रही हैं, जिससे जंगलों में आग लगने की आशंकाओं का पूर्वानुमान लगाया जा रहा है, जिससे समय रहते वनाग्नि की रोकथाम हो रही है। इस दौरान मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. धीरज पांडे आदि मौजूद रहे।
डीएफओ और एसडीओ की सराहना
प्रमुख वन संरक्षक ने डीएफओ डॉ. एनसी पंत और एसडीओ नेहा सौन चौधरी की सराहना की। कहा कि दोनों ने ही वनाग्नि की रोकथाम और विभाग के विकास कार्यों को प्राथमिकता से गति दी है। डीएफओ ने कम समय कई सराहनीय कार्य किए हैं। बताया कि प्राकृतिक जल स्रोतों और नौलों को चिह्नित कर तीन वर्षीय परियोजनाओं के माध्यम से और मृदा संरक्षण, पौधारोपण व जल संरक्षण के कार्य कैंपा और जायका योजना से किए जा रहे हैं।