बिहार में शराबबंदी के एलान ने बहस सैकड़ों मील दूर उत्तराखंड में छेड़ दी है। इसकी वजह भी साफ है। पहाड़ पर शराब ने आम लोगों की खुशियां छीनी है। हर शाम छलकने वाले जाम ने सबसे ज्यादा महिलाओं के जख्मों को हरा किया है। बीमारी और अभावों के अलावा घर के कलह ने बड़ी तादात में ग्रामीणों को रुलाया है। शराब और दूसरे नशे से उपजी इस पीड़ा को यहां के क्वैराला घाटी के कवि प्रकाश जोशी शूल ने कविताओं के जरिए उभारा है। चुनाव के वक्त शराब पिलाकर वोट बटोरने वाले नेताओं को आड़े हाथ लेते हुए पीने-पिलाने का खेल बंद करने का यूं आग्रह किया गया है-शराब जन पिलाया, ओ म्यारा देशा का नेता। क्याहीं तुम बनंछा, शराबी में विजेता।
पियक्कड़ों की तादात बेशक तेजी से बढ़ रही है, मगर इसके खिलाफ उठने वाली आवाजें इस जिले में कभी नहीं थमी। आंदोलनों की राह से अलग कविता ने भी इसमें भागीदारी की है। जनकवि प्रकाश जोशी शूल ने इस कविता संग्रह जन पिया शराब (शराब मत पीना) के जरिए शराब और तमाम नशों के खिलाफ अलख जगाने की कोशिश की है। कुमाऊंनी में प्रकाशित इस पहली पुस्तक में नशाखोरी के खिलाफ माहौल बनाने की पहल की गई है।
जन दिया बौज्यू, शराबि बर, चाहे दी दिया गरीब घर (कन्या द्वारा शराबी वर के बजाय गरीब वर की अपनी भाभी से गुजारिश की गई है)। नशेड़ी की सामाजिक गिरावट को भी चित्रित किया गया है, जो पेलो दारू कि बोतल और जु लगालो अत्तरा का सुट्टा। वीको गटर में होलो मुड़ो तू, नालि में हवाला खुट्टा। नशे से सेहत को होने वाले नुकसान और कैंसर तक का डर कविता में दिखाया गया है। जिन पिया शराब, बिड़ि सिकरट, तमाख, अत्तर, जिन खाया सुरति और गुटका। कलैकि इन सबौंले प्यारा दाज्यू कल्ज में है जानौन ठुला-ठुला पुटका।
नशेड़ी गांवों में मुफ्त बंटेगी जन पिया शराब
अब बिहार के एलान से उत्साहित कवि और साहित्यकार प्रकाश जोशी शूल ने इस पुस्तक के नए संस्करण को प्रकाशित करवाकर नशे के आगोश में डूबे गांवों में निशुल्क बंटवाने का एलान किया है। शराब समेत तमाम नशे के खिलाफ 2011 से स्कूली बच्चों के बीच अभियान चलाने वाले शूल ने बिहार की तर्ज पर उत्तराखंड में भी शराबबंदी की मांग करते हुए सीएम को ज्ञापन भेजा है। साथ ही पीएम से करों से होने वाले राजस्व के नुकसान की भरपाई में सहयोग की अपील की है।