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कोरोना की मार से लंबा हुआ ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों का इंतजार

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चंपावत। कोरोना की मार से लटके उप चुनावों ने चंपावत जिले की कई ग्राम पंचायतों के लोगों को प्रतिनिधित्वहीन कर दिया है। कोरोना की वजह से स्थगित हुए उप चुनाव से जिले में ही 11 ग्राम पंचायतों का गठन नहीं हो सका है। पिछले साल इन पंचायतों के खाली पंचायत सदस्य के पदों को नामित करने और प्रधान के स्थान पर प्रशासक की तैनाती कर वैकल्पिक उपाय जरूर किए गए।
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भले ही कोरोना काल में पिछले साल अक्तूबर-नवंबर में बिहार विधानसभा के चुनाव और मप्र विधानसभा की 28 सीटों पर उप चुनाव होने के साथ ही पंजाब, गुजरात सहित कई राज्यों में नगर निकायों और पंचायती चुनाव भी निपट गए हों, लेकिन उत्तराखंड में अभी त्रिस्तरीय पंचायती उप चुनाव नहीं हो पा रहे हैं। प्रदेश के सबसे छोटे जिले चंपावत में ही दो ग्राम प्रधान, एक बीडीसी सदस्य, 11 उप प्रधान और 210 ग्राम पंचायत सदस्यों के पद खाली हैं। अक्तूबर-नवंबर 2019 को हुए चुनाव के बाद पिछले साल फरवरी में उप चुनाव हुए थे। इसके बावजूद ये सीटें खाली रह र्गइं। कोरोना की वजह से पिछले साल मार्च से उप चुनाव पर रोक लगी है। इसके चलते चंपावत जिले की 11 ग्राम पंचायतें अस्तित्व में नहीं आ सकीं हैं। कोरोना से ये ग्राम पंचायतें प्रतिनिधित्वहीन हो गईं हैं।
जिले की सभी 2303 ग्राम पंचायतों में से 2093 ही भरी जा सकीं हैं।
सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी (पंचस्थानी) संजीव रावत ने बताया कि जिले में 210 ग्राम पंचायत सदस्यों की सीटें खाली हैं। इनमें चंपावत में सबसे ज्यादा 80, पाटी में 73, लोहाघाट में 31 और बाराकोट ब्लॉक में 26 सीटें रिक्त हैं। डीपीआरओ सुरेश बेनी ने बताया कि प्रदेश शासन ने उप चुनाव नहीं होने तक वैकल्पिक व्यवस्था के पिछले साल आदेश जारी किए थे। आदेश के तहत ग्राम प्रधान की खाली दो कुर्सियों पर प्रशासकों की तैनाती की गई थी, जबकि कलीगांव को छोड़ ग्राम पंचायत सदस्यों के खाली पदों को नामित सदस्यों से भरा गया है। कलीगांव ग्राम पंचायत से सदस्यों के खाली पद के भरने के लिए एक भी नाम नहीं आया।
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विकास पर भी पड़ रहा है असर
चंपावत। गांवों की नुमाइंदगी नहीं होने से लोग ग्राम पंचायत स्तर पर अपने प्रतिनिधि के बगैर हैं। पूर्व प्रधान मदन राम का कहना है कि गठन नहीं होने से विकास के काम से लेकर कई तरह के प्रमाणपत्र नहीं बन पा रहे हैं। कलीगांव ग्राम पंचायत में एक भी सदस्य नहीं होने से खुली बैठक नहीं हो पा रही हैं। इससे आवास से लेकर विकास संबंधी प्रस्ताव तक नहीं बन पा रहे हैं। एडीओ (पंचायत) उमेद राम का कहना है कि राज्य और केंद्र वित्त से मिली राशि का उपयोग नहीं हो पा रहा है।
डीपीसी की भी खाली है एक सीट
चंपावत। डीपीसी (जिला नियोजन समिति) की 16 में से एक सीट खाली है। डीपीसी में जिला पंचायत से 13 और नगर निकायों से 3 सीटें हैं। इनमें से 15 सीटों पर पिछले साल फरवरी में निर्विरोध निर्वाचन हो गया था लेकिन कोरोना की वजह से पिछले साल 24 मार्च को होने वाले लोहाघाट नगर पंचायत सीट के लिए मतदान स्थगित कर दिया गया था। 14 मतदाताओं वाली इस सीट से दो प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। जिला प्लान की योजना के अनुमोदन का जिम्मा डीपीसी का है।
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