नगर से सात किमी दूर गौड़ी क्षेत्र में मिलीं दो सुरंगों का संबंध चंद काल से हो सकता है। गौड़ी क्षेत्र में पिछले दिनों दो सुरंगों का पता चला है। इनमें से एक बंद हैं जबकि दूसरी करीब 800 मीटर लंबी है। गौड़ी से निकली इस सुरंग का दूसरा हिस्सा गंडक नदी तक जाता है।
इस सुरंग का संबंध चंद राजा ज्ञान चंद (1365 से 1420) से जोड़कर देखने के पक्ष में सबसे मजबूत दलील गौड़ी क्षेत्र के पार मड़चमार के रूदाली तोक में ज्ञान चंद का मंदिर होने की दी गई है। चंपावत के इतिहासकार डॉ. प्रशांत जोशी का दावा है कि 14वीं सदी में चंद राजाओं का सोर और नेपाल के डोटी क्षेत्र से अक्सर युद्ध होता रहता था। ऐसे में ये सुरंगें सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहीं होंगी।
युद्ध में रसद, हथियार छिपाने, हमला करने और आवाजाही के लिए इन सुरंगों का उपयोग किया जाता होगा। उनका कहना है कि राजा ज्ञानचंद के उस क्षेत्र में होने के प्रमाण पास में ही स्थित मंदिर और जागरों (देव डांगरों को अवतरित करने के लिए सुनाई जाने वाली कथा) में भी मिलते हैं।
ज्ञान चंद को मड़चमार में देवता के रूप में पूजा जाता है। यहां एक मंदिर भी बनाया गया था। मान्यता है कि जब ज्ञान चंद का भीषण युद्ध हुआ तो उस दौरान बसान गांव में ज्ञान चंद का सिर, रुदमाली में धड़ और कोट में रक्त गिरा था। अब भी इन तीनों गांवों में लगने वाले जागर में जिक्र मिलता है। तीनों गांवों में ज्ञान चंद के मंदिर अब भी मौजूद हैं। मड़चमार के प्रधान प्रकाश नेगी ने बताया कि तीनों गांवों में जब जागर लगाई जाती है तो ज्ञानी चंद देवता अवतरित होते हैं ।
ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विकसित हो गौड़ी क्षेत्र
चंपावत। गौड़ी क्षेत्र के बुजुर्ग ग्रामीणों ने सुरंग वाले स्थान को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करने का प्रशासन से आग्रह किया है। बुजुर्ग ग्रामीण गोपाल सिंह और नाथ सिंह ने कहा कि गौड़ी क्षेत्र सुरंग सहित कई ऐतिहासिक धरोहरों से भरा है।
यहां जिम कार्बेट की ओर से बाघ को मारने से लेकर सुरंग और कई ऐतिहासिक मंदिर हैं। ऐसे में इस क्षेत्र का व्यापक अध्ययन कर इसे इतिहास की धरोहर के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उधर, डीएम सुरेंद्र नारायण पांडेय ने कहा कि वह पूरे मामले का सर्वे करा जरूरी कार्रवाई की संस्तुति करेंगे।
ग्रामीण गोपाल सिंह।- फोटो : CHAMPAWAT