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32 साल बाद फिर से शुरू हुई परंपरा

Sun, 04 Sep 2016 10:04 PM IST
योगेश जोशी/अमर उजाला, चंपावत
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32 साल बाद फिर से शुरू हुई परंपरा - फोटो : अमर उजाला
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 हरताली तृतीया को गंडकी नदी के किनारे स्थित ऐतिहासिक धर्मशिला 32 साल बाद फिर गुंजायमान हो उठी। शंख-घंट और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच तिवारी समुदाय के लोगों ने धर्मशिला में ऋषि तर्पण किया और नई जनेऊ धारण की। 1984 में अंतिम बार तिवारी समुदाय ने इस ऐतिहासिक स्थल पर ऋषि तर्पण किया था। तब से ये परंपरा बंद थी। त्यारकूड़ा के उत्साही युवकों के प्रयासों से इस बार ये परंपरा दोबारा चालू हो सकी है।
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ऐतिहासिक महत्व होने के बावजूद धर्मशिला की उपेक्षा त्यारकूड़ा के युवाओं को नागवार गुजर रही थी। वर्षों पहले बचपन में हरताली तृतीया के दिन धर्मशिला पर होने वाला आयोजन उनकी आंखों के आगे बार-बार घूम रहा था। इसी पीड़ा ने बंद पड़ी परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए प्रेरित किया। ललित मोहन, गिरीश तिवारी, प्रकाश तिवारी, हरीश तिवारी आदि युवाओं ने चार दिन पहले धर्मशिला में सीढ़ियों का निर्माण, समतलीकरण और रंगरोगन कर इस दिशा में पहला कदम बढ़ाया। इलाके के लोगों के प्रयासों से 32 साल तक बंद रही परंपरा को फिर से शुरू करवाया जा सका। अब युवाओं का अगला मकसद यहां धर्मशाला और देवी का मंदिर बनाना है।


गौतम ऋषि ने की थी धर्मशिला की स्थापना
बुजुर्ग पीसी तिवारी बताते हैं कि धर्मशिला की स्थापना पुरातन समय में गौतम ऋषि ने की थी। कालांतर में पांडवों ने इस स्थान पर अपने पूर्वजों का तर्पण किया था। बड़े-बड़े पत्थरों के बीच सपाट पत्थर बना है। उत्तरमुखी गंडकी नदी के किनारे स्थित होने से इसकी महत्ता और बढ़ जाती है।
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ये है धर्मशिला की मान्यता
त्यारकूड़ा के बुजुर्ग पूरन चंद्र का कहना है कि किसी वजह से श्राद्ध छूट जाने पर धर्मशिला में फिर से श्राद्ध उठाया जा सकता है, इसके लिए हरिद्वार अथवा अन्य तीर्थ स्थल पर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। बारिश नहीं होने पर इसी स्थान से घड़े में जल भर कर घटोत्कच मंदिर में चढ़ाया जाता है। इसके अलावा चंद्र या सूर्यग्रहण समाप्त होने के बाद इस स्थान पर स्नान करने की भी परंपरा है।
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