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नई डिजाइन से भरेंगी मां पूर्णागिरि मंदिर की चट्टानों की दरारें

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मां पूर्णागिरि धाम में कई जगह आई दरारें। - फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थल मां पूर्णागिरि मंदिर की चट्टानों में आई दरारों को भरने (रीस्टोरेशन) के लिए अब नई डिजाइन बनाई जाएगी। इन दरारों से इस ऐतिहासिक मंदिर की सुरक्षा को खतरा बना हुआ है। काम में आ रही जटिलता और निविदाओं में आवेदकों की कम दिलचस्पी के कारण डिजाइन को बदलने का निर्णय लिया गया है। डिजाइन बदलने का काम पुणे की एक स्वतंत्र परामर्शदाता एजेंसी के आशीष घुड़पड़े को दिया गया है। उन्हें संशोधित डिजाइन के साथ विस्तृत प्रगति रिपोर्ट (डीपीआर) 28 फरवरी तक कार्यदायी संस्था विश्व बैंक की निर्माण शाखा को देनी होगी। विश्व बैंक की निर्माणदायी संस्था के ईई एससी आर्या ने बताया कि इस संशोधित डीपीआर के आधार पर आगे की कार्यवाही की जाएगी।
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मां पूर्णागिरि के मुख्य मंदिर की पहाड़ी में 2008 से कई जगह करीब पांच इंच चौड़ी दरारें नजर आने लगी थीं। एनएचपीसी, केंद्रीय जल आयोग, वाप्कोस कंपनी ने शुरुआती डीपीआर बनाई थी। 2015 में शासन ने उत्तराखंड आपदा राहत परियोजना (यूडीआरपी) से परामर्शदाता एजेंसी से सर्वे कराया। भूगर्भीय रिपोर्ट और परामर्शदाता एजेंसी ने 5500 फीट की ऊंचाई वाले इस धाम की दरारों को भरने के साथ मुख्य मंदिर से 700 मीटर तक पैदल मार्ग की दो फीट की चौड़ाई को बढ़ाकर आठ फीट तक करने का सुझाव दिया था, लेकिन तीन बार निविदा निकाले जाने के बाद निविदादाताओं की दिलचस्पी नहीं रही।
कोट...
राष्ट्रीय निविदा आमंत्रित करने के बावजूद धार्मिक आस्था की वजह से नौ करोड़ रुपये के इस काम में निर्माणदायी कंपनी कम दिलचस्पी ले रही है। जो अकेले निविदादाता इसमें आए भी, उन्होंने 108 प्रतिशत ज्यादा दर पर निविदा डाली थी। जिसे समिति ने अस्वीकार कर दिया। मंदिर के शिखर से करीब 30 मीटर नीचे तक दरार भरने का शुरुआती प्रस्ताव है। अलबत्ता दरार भरने के तरीकों और डिजाइनिंग में होने वाला अंतर परामर्शदाता एजेंसी की रिपोर्ट के बाद तय किया जाएगा। - श्याम शुभम, सहायक अभियंता, विश्व बैंक निर्माण शाखा, चंपावत।
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पुरानी डिजाइन के आड़े आई भौगोलिक जटिलता
आस्था के धाम मां पूर्णागिरि के शिखर की संवेदनशीलता के अलावा भौगोलिक रूप से दुरुहता इसके आड़े आ रही है। इसी वजह से ऊर्जा शक्ति मंत्रालय की वाप्कोस कंपनी की डीपीआर और डिजाइन के अनुरूप काम नहीं हो सका। यहां तक कि तीन बार निविदा होने के बावजूद निविदादाता भी आगे नहीं आ रहे हैं। मां पूर्णागिरि मंदिर शिवालिक चट्टानयुक्त क्षेत्र में स्लेटी बलुआ पत्थर युक्त चट्टानों पर स्थित है। ये चट्टान अत्यधिक भंगुर प्रकृति की है और आसानी से रेत के रूप में बदल सकती है। कमजोर चट्टानों के साथ संधियुक्त होने से मंदिर की स्थिति संवेदनशील है।
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मरम्मत को लेकर भूवैज्ञानिकों के ये थे मुख्य सुझाव
1. चट्टानों की दरारों में दबाव से सीमेंट मोर्टार भरा जाए।
2. मंदिर के नीचे चट्टानों में लोहे की जाली लगाकर दबाव से सीमेंट मोर्टार डाला जाए।
3. मंदिर के पास दरारयुक्त हिस्से से पेड़ों को हटाया जाए।
4. मंदिर के नीचे उपलब्ध 10 मीटर गुना 8 मीटर भाग से मंदिर के पास तक आरसीसी की सीढ़ीनुमा मजबूत दीवार का निर्माण किया जाए।
5. सुरक्षा संबंधी काम से पूर्व अभियांत्रिकी मार्गदर्शन जरूरी।
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