उत्तराखंड सेवा का अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सोमवार को जिला कार्यालय सभागार में एक दिनी कार्यशाला का आयोजन किया गया। सेवा का अधिकार आयोग के आयुक्त डीएस गर्ब्याल की अध्यक्षता में आयोजित कार्यशाला में विभिन्न विभागों के पदाभिहित अधिकारियों एवं अपीलीय अधिकारियों ने प्रतिभाग किया।
इस मौके पर आयोग अध्यक्ष डीएस गर्ब्याल ने कहा कि वर्ष 2014 में गठित आयोग में गठन के बाद 10 विभागों की 94 सेवाओं को अधिसूचित किया गया था। आयोग के प्रयास के फलस्वरूप वर्तमान में 18 विभागों की सेवाएं आयोग में अधिसूचित हो गई हैं। 14 विभागों की 160 सेवाओं को अधिसूचित करने के लिए आयोग ने शासन को संस्तुति भेजी गई है। बताया कि नागरिक अधिकारों के लिए प्राप्त आवेदन को निरस्त किए जाने पर सूचना आवेदक को समय से दी जानी चाहिए।
आयोग के सचिव पंकज नैथानी ने बताया कि आवेदक पर कमी पाए जाने पर पावती देते हुए उसमें रह कमियों को दर्शाना होगा। कार्यशाला में सहायक रजिस्ट्रार बीपी नौटियाल, पुलिस अधीक्षक धीरेंद्र गुंज्याल, एडीएम हेमंत वर्मा, एसडीएम सीमा विश्वकर्मा, निर्मला बिष्ट, अनिल चन्याल, पीडी एचजी भट्ट, डीडीओ आरसी तिवारी, पुलिस क्षेत्राधिकारी पीएस कफलिया,आरएस रौतेला आदि मौजूद थे।
आवेदन प्राप्त होने पर पावती देना जरूरी
चंपावत। आयोग आयुक्त ने कहा कि सेवा में पारदर्शिता आए इसके लिए कार्यालय में सूचना पट स्थापित कर उसमें आमजन को दी जाने वाली सभी सुविधाओं की जानकारी अंकित करनी होगी। साथ ही प्राप्त आवेदन को अंकित करने के लिए पंजिका भी रखनी होगी। उन्होंने कहा कि आवेदक को आवेदन प्राप्त होने पर पावती भी देनी जरूरी है, जिससे आवेदक अपील में जा सके।
प्रतिदिन ढाई सौ से लेकर पांच हजार तक शुल्क
चंपावत। सेवा का अधिकार अधिनियम की धारा-9 के अनुसार आवेदक के कार्य में देरी होने पर प्रतिदिन 250 रुपये और अधिकतम पांच हजार रुपये तक का विलंब शुल्क संबंधित अधिकारी से वसूला जाएगा। जिससे आवेदक की क्षतिपूर्ति की जाएगी। आयोग के सहायक रजिस्ट्रार बीपी नौटियाल ने कहा कि बजट के अभाव में निरस्त आवेदनों के साथ विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित नागरिक सुविधाओं की खबरों पर भी आयोग संज्ञान ले रहा है।