चुनावी बिगुल बजने के बाद से जिले की दोनों विधानसभा सीटों में तीन सियासी दलों समेत कुल 10 उम्मीदवार चुनाव मैदान में है। इसमें लोहाघाट सीट पर छह और चंपावत सीट से चार प्रत्याशी मैदान में हैं, मगर इनमें से ज्यादातरों के पास एजेंडे का टोटा है। जनता को लुभाने को नारे तो हैं, मगर उनके घाव को दूर करने के लिए मरहम नहीं।
चंपावत सीट पर सत्तारूढ़ कांग्रेस की स्थिति पसोपेश भरी है। जिला मुख्यालय के नागरिक कई अहम मुद्दों पर उसे कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। बेशक इस क्षेत्र में उप तहसील, डिग्री कॉलेज, पॉलीटेक्निक, आईटीआई आदि संस्थान खुले हो, मगर इन संस्थानों के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी और आधे-अधूरे विकास कार्य क्षेत्र की उपेक्षा को बयां करते हैं। दूरदराज की छोड़िए, स्वयं जिला मुख्यालय के हाल भी इससे अलग नहीं है।
भाजपा समेत कई विपक्षी दलों का आरोप है कि पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी की मुख्यालय में स्टेडियम निर्माण की घोषणा के बावजूद इसका बनकर तैयार होना तो दूर, अब तक भूमि की तलाश तक नहीं हो सकी है। जिला मुख्यालय की बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी का आरोप भी विपक्ष लगाता है। पहाड़ की आवाजाही का इकलौता जरिया सड़क परिवहन की धुरी रोडवेज बस स्टेशन भी महज नाममात्र का खुल सका है। टनकपुर-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग की अकेली सड़क वाले इस क्षेत्र में न बाईपास है, न ही रिंगरोड। इन मुद्दों पर कांग्रेस बचाव की मुद्रा में तो है, मगर जनहित के मुद्दों की अनदेखी सिर्फ वही कर रही है, ऐसा भी नहीं है। सत्ता का सपना संजोने वाली भाजपा ने भी इन समस्याओं पर अक्सर चुप्पी साध विपक्ष के धर्म का निर्वाह नहीं किया। अलबत्ता चुनावी समर में ये मुद्दे उसकी लड़ाई के अस्त्र जरूर हैं।
तेज हुई मोदी बनाम हरीश रावत की जंग
विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस एवं विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के पास स्थानीय मुद्दों की कमी और अभाव हो, लेकिन दोनों ही पार्टियों के बीच मोदी बनाम हरीश रावत की जंग जरूर तेज हो गई है। राज्य की विधानसभा के लिए होने वाले चुनाव के केंद्र में पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हरीश रावत के बीच जंग सिमटती जा रही है। राज्य सरकार अपनी नाकामियां छिपाने के लिए जहां हर मुद्दे पर केंद्र की मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही है। वहीं भाजपा की ओर से हरीश रावत सरकार में हुई तमाम गड़बड़ियों को लेकर सवाल पूछे जा रहे हैं।