देवीधुरा धाम देवीधुरा में विशाल शिलाखंडों के बीच में बनी गुफा।
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मां बाराही धाम देवीधुरा में आषाढ़ी कौतिक को होने वाला बग्वाल मेला उत्तर भारत में खास मुकाम रखता है। इस वर्ष 7 अगस्त को होने वाले बग्वाल को देखने के लिए हजारों लोग यहां आएंगे। जिला मुुख्यालय से 60 किमी दूर 7000 फीट ऊंचाई में स्थित मां वज्र बाराही के धाम देवीधुरा का जिक्र साहसिक शिकारी और लेखक जिम कार्बेट ने अपनी मैन इटर ऑफ कुमाऊं नामक पुस्तक में किया है। कहा जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान पत्थर युद्ध को रोकने के लिए चारों खामों को रबड़ या गोबर की गेंद से बग्वाल खेलने का आदेश दिया गया था। आदेश देने वाले तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी जब बीमारियों से ग्रस्त हुआ, तो उसने दैवीय शक्ति को मानते हुए आदेश वापस ले लिया।
लाखों लोगों की आस्था का प्रतीक मां बाराही धाम में प्राचीनकाल से बग्वाल की परंपरा चली आ रही है। यह प्रथा कब से प्रारंभ हुई, इस बारे में कोई पुख्ता तिथि कहीं भी अंकित नहीं है। मेला समिति के मुख्य संरक्षक लक्ष्मण सिंह लमगड़िया और मंदिर के पीठाचार्य आचार्य कीर्ति बल्लभ जोशी बताते हैं कि यहां पर बग्वाल की परंपरा महाभारत काल से चल रही है। मेले में लाखों लोग इस अद्भुत नजारों को देखने के लिए यहां एकत्र होते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक चम्याल, लमगडिय़ा खाम, गहड़वाल और वालिक खाम के लोगों में हर साल नर बलि दिए जाने की प्रथा थी। कहते हैं कि चम्याल खाम की वृद्धा के एक मात्र पौत्र की बलि देने की बारी आने पर उन्होंने मां बाराही की उपासना की। वृद्धा की तपस्या से प्रसन्न होकर मां बाराही ने विकल्प खोजने के लिए कहा। चारों खामों की सहमति से एक व्यक्ति के बराबर रक्त बहाकर मां की पूजा की जाने की परंपरा शुरू हुई।
क्या होती है बग्वाल
आषाढ़ी कौतिकी को चार खाम और सात थोकों की सामूहिक पूजा-अर्चना के बाद पूर्वी छोर से चम्याल और गहड़वाल खाम पश्चिमी छोर से वालिक तथा लमगडिय़ा खामों एवं उनके सहयोगी मां बाराही धाम के खोलीखांड-दूबाचौड़ मैदान में फर्रों (ढाल) के सहारे एक-दूसरे धड़ों में पत्थरों की मार करते हैं। जख्मों की परवाह किए बगैर ये रणबांकुरे एक दूसरे पर पत्थरों की बौछार करते हैं। हालांकि सारे बग्वाली वीर आपस में नाते रिश्तेदार होते हैं। लेकिन युद्ध के दौरान एक दूसरे का रक्त बहाने के लिए बेताब रहते हैं। युद्ध में एक व्यक्ति के बराबर रक्त बहने के बाद मंदिर के पुजारी चंवर झुलाते हुए युद्ध विराम का संकेत देते हैं। बग्वाल के बाद सभी लोग आपस में भाईचारे के साथ एक दूसरे के गले मिलते हैं।