सुंई और बिशुंग गांवों के मां भगवती, मां कड़ाई देवी, मस्टामंडाली और आदित्य महादेव के मंदिर में पूजा करने वाले पुजारी और पुरोहित कठोर नियमों का पालन कर साल पूजा-अर्चना करते हैं। इन देवी-देवताओं के मंदिरों को चारद्योली के नाम से जाना जाता है। क्षेत्रीय लोगों में इनके प्रति जबर्दस्त आस्था है। यहां तक पुजारी रहने के दौरान सालभर घर से बाहर मंदिर में ही संयम व नियमपूर्वक रहना होता है। ऐसा इन मंदिरों की शुद्धि की वजह से होता है। सोमवार को आषाढ़ी कौतिक के दिन भगवती मंदिर के पुजारी को बदला जाएगा।
यहां चौबे जाति के लोगों को मां भगवती मंदिर और पुजारी जाति के लोगों को आदित्य महादेव मंदिर में पूजा का अधिकार मिला हुआ है। मस्टा मंडाली मंदिर में चनकन्याल, चतुर्वेदी, पांडेय, सक्टा, ओली आदि जाति के लोग पूजा करतेे हैं। इसी प्रकार कड़ाई देवी मंदिर में भी बिशुंग व सुंई क्षेत्र के जाति विशेष व देव डांगरों को पूजा का अधिकार है। पूजा के दिनों में पुजारी को वर्षभर घर-गृहस्थी से दूर रहते हुए नंगे पांव, बिना दाड़ी-बाल बनाए कठोर जप व तप करना पड़ता है। पुजारी विशेष पर्वो में पांच गांव सुंई व 20 गांव बिशुंग की नंगे पांव परिक्रमा कर दूध, अक्षत एकत्र कर देवी-देवताओं को परंपरागत रूप से भोग लगाते आ रहे हैं। जिस व्यक्ति की पूजा की बारी होती है, वह सालभर अपने घर में प्रवेश नहीं करता तथा वह स्वयं बनाया हुआ सात्विक भोजन ग्रहण करता है।
इस बार भगवती मंदिर के पुजारी नारायण दत्त चौबे है। रथयात्रा की परिक्रमा के बाद मंदिर के नए पुजारी गद्दी संभालेंगे। 7 अगस्त को आषाढ़ी कौतिकी के बाद दिन-वार व नक्षत्र को देखते हुए पुजारी बदले जाएंगे। वहीं आदित्य महादेव मंदिर के पुजारी संजय पुजारी हैं। आदित्य महादेव मंदिर के पुजारी दीपांशु पुजारी बताते हैं कि यहां अक्तूबर बाद बदलाव होगा।