तमिलनाडु के रहने वाले शिक्षक के. रमेश का हिंदी से कोई खास वास्ता नहीं था। न वे हिंदी बोलने वाले राज्य के निवासी हैं और न ही हिंदी उनका विषय है लेकिन फिर भी वे अधिकारपूर्वक हिंदी बोलते हैं। सिर्फ बोलते ही नहीं, दूसरे गैर हिंदी भाषी साथियों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं। उनकी इस खूबी को देखकर जेएनवी की प्रधानाचार्य बीनू जैन कहती हैं कि रमेश भाषाई सद्भाव के सेतु का काम कर रहे हैं।
तमिलनाडु में 60 के दशक में हिंदी के विरोध में हिंसक आंदोलन हुआ था। और आज भी वहां हिंदी को लेकर नजरिया बदला नहीं है। मगर इसी राज्य के रमेश को हिंदी अपनी भाषा लगती है। फर्राटेदार हिंदी बोलने वाले इस शिक्षक में हिंदी को लेकर खास लगाव है। इसे आश्चर्य ही कहा जाएगा कि जवाहर नवोदय विद्यालय में जीव विज्ञान के इस शिक्षक ने जिंदगी के शुरुआती दो दशक तक न कभी हिंदी बोली और न पढ़ी। लेकिन अपने जज्बे और सीखने की ललक से उन्होंने करीब एक साल में इसे सीख लिया। अब लगातार हिंदी भाषियों के संपर्क में रहने से इस भाषा में निपुणता हासिल कर ली है।
जीवविज्ञान में एमएससी के. रमेश बताते हैं कि वे हिंदी की वर्णमाला से भी वाफिक नहीं थे और पीजी तक वे तमिल के अलावा अंग्रेजी जानते थे। 1997 में उड़ीसा में नवोदय विद्यालय में पहली तैनाती के दौरान उन्होंने उड़िया भाषा सीखी। फिर वहां एक हिंदी भाषी शिक्षक के संपर्क में आकर हिंदी जानने को उत्सकुता जगी। मगर उड़ीसा में हिंदी बोलने वाले लोग कम मिल पाते थे। ऐसे में हिंदी जानने के लिए व्याकरण, हिंदी भाषा की पुस्तकों से लेकर हिंदी समाचार पत्र का सहारा लिया, तो समझ बढ़ाने के लिए हिंदी फिल्मों को देखा।
2008 में चंपावत में तैनाती के बाद से हिंदी बोलने का प्रवाह भी हिंदी भाषियों से मिलता जुलता हो गया है। अब वे अपने गैर हिंदी भाषी साथियों को भी हिंदी बोलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका कहना है कि अनेकता में एकता का साकार रूप हिंदी भाषा है। बस जरूरत इसे अधिक रोजगारपरक बनाने की है।